इस्कलता ब्रजचंद की, जो बाँचै दै चित्त ।
वृंदावन सुखधाम सो, लहै नित्त ही नित्त ॥
- श्री आनंदघन, घनानंद ग्रंथावली, इश्क़लता (44)
जिसको ब्रजचन्द्र श्री कृष्ण के दिव्य प्रेम की चाह हो तो वे अपने मन का अनुराग सुख के धाम श्री वृंदावन से करे और नित्त ही नित्त प्रेम की लहरों में डूबा करे ।
वृंदावन सुखधाम सो, लहै नित्त ही नित्त ॥
- श्री आनंदघन, घनानंद ग्रंथावली, इश्क़लता (44)
जिसको ब्रजचन्द्र श्री कृष्ण के दिव्य प्रेम की चाह हो तो वे अपने मन का अनुराग सुख के धाम श्री वृंदावन से करे और नित्त ही नित्त प्रेम की लहरों में डूबा करे ।

