जमुनापुलिन कुंज गहिवरकी - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (65)

जमुनापुलिन कुंज गहिवरकी - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (65)

(राग चैती गौरी)
जमुनापुलिन कुंज गहिवरकी, कोकिल ह्वै द्रुम कूक मचावौं। [1]
पदपंकज प्रिय लाल मधुप ह्वै, मधुरी मधुरी गुँज सुनावौं॥ [2]
कूकरि ह्वै वनवीथिन डोलौं, बचे सीथ रसिकनके पावौं। [3]
ललितकिशोरी आस यहै मम, व्रजरज तजि छिन अनत न जावौं॥ [4]

- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (65)

ऐसा कब होगा जब मैं कोयल बन कर यमुना पुलिन की गह्वर वन की कुञ्ज की लता पर बैठ कर मधुर स्वर से गान करूँगा? [1]

ऐसा कब होगा जब मैं भृंग बन कर प्रियालाल के चरण कमलों पर मंडराते हुए उन्हें मधुर स्वर से गुंजार सुनाऊंगा? [2]

ऐसा कब होगा जब मैं कूकरि बन कर वृंदावन में डोलूँगा एवं रसिकों की बची हुई झूठन प्रसादी को पाउँगा? [3]

श्री ललितकिशोरी जी कहते हैं कि मेरी यही अभिलाषा है की ब्रज रज को छोड़कर एक क्षण के लिए भी कहीं और न जाऊँ। [4]