जन्म :
गो. श्रीराधालाल जी का जन्म 1885 की आश्विन बदी तृतीया के दिन वृन्दावन में हुआ था। इनके पिता गो. श्रीगोवर्द्धनलाल जी श्रीराधावल्लभ मन्दिर के रासवंशीय सेवाधिकारी थे।
जै जै श्रीहित रूप श्रीराधालाल जू।
श्रीगोवर्द्धनलाल-सुवन रस-जाल जू॥
प्रगटे श्रीवन धाम राधिका अंश जू।
असित पक्ष सु मास आश्विन, तिथि जु तृतिया सुख दये।
- प्रीतमदास जी, हित चन्द्र प्रकाश, गो. राधालाल जू की मंगल बधाई, पृ. सं. 234
गोस्वामी श्री गोवर्धनलाल जी के पुत्र, रस की खान, श्री हित स्वरुप गोस्वामी श्री हित राधालाल जी की जय हो, जो श्री राधा के अंश हैं एवं जिनका श्री वृन्दावन में आश्विन कृष्ण तृतीया को सबको सुख प्रदान करने हेतु प्राकट्य हुआ है।
बाल्यकाल :
जन्मकाल से ही इनके द्वारा ऐसे अद्भुत-अद्भुत कार्य सम्पन्न हुए जिन्हे देखकर इनके माता-पिता तक को भी ऐसा अनुमान होने लगा कि यह बालक कोई विलक्षण विभूति ही है -
जनमत ही पितु परचौ पायौ, मंगल भूरि रचायौ।
- प्रीतमदास जी, हित चन्द्र प्रकाश, गो. राधालाल जू की मंगल बधाई, पृ. सं. 236
माता-पिता का प्रभाव बालक पर बाल्यकाल से पड़ना स्वाभाविक ही होता है। यही कारण है कि बाल्यकाल से ही इनकी रुचि श्रीराधावल्लभलाल जी की सेवा में थी। ये उनकी श्रीअंग-सेवा के साथ-साथ पाक-सेवा, वस्त्राभूषण सुसज्जित करने की सेवा, फूल-श्रृंगार की सेवा, पद-गायन की सेवा और सोहनी-सेवा भी अपने हाथ से ही किया करते थे। गो. गोवर्द्वनलाल जी के शिष्य रसिकवर राधिकाशरण जी ने इनके इस सेवा परायण स्वरूप को निम्नांकित शब्दों में निरावरण किया है -
सेवत जुगलकिशोर, अब्द जब पाँच कैं।
करत मंगला प्रात, लखी मैं जाँच कैं॥
जाय देखी आरती, कर-कमल फेरत सोहनी।
कहा कहौं मैं छकनि अपनी, देखि भाव सु मोहनी॥
होत अचरज पाय दरसन, परम लघु अति बाल जू।
जै जै श्रीहित रूप, श्रीराधालाल जू॥
- राधिकाशरण जी, श्रीहित राधिकाशरण जी की वाणी, पृ. स. 39
गोस्वामी श्री हित राधालाल जी पांच वर्ष की अवस्था में श्री राधावल्लभ जी की सेवा करते थे। प्रातः मंगला आरती करते हुए उन्हें मैंने स्वयं देखा है। जब मैं आरती दर्शन करने जाता तब गोस्वामी जी स्वयं अपने हाथों से सोहनी सेवा करते। उनके मोहनी दर्शन मात्र से मैं भाव-विव्हल हो जाता, जिसका मैं वर्णन नहीं कर सकता। इतने छोटे बालक की सेवा का दर्शन कर मुझे आश्चर्य होता।
रसिकवर प्रीतमदास जी ने भी इनके इष्ट-सेवा-संनिष्ट रूप का चित्रण इन शब्दों में किया है -
सब काल हित करि-करि लड़ाये, हित लड़ैती-लाल री।
वसन-भूषन राग-भोग सु, प्रेम युत हित पाल री॥
- प्रीतमदास जी, हित चन्द्र प्रकाश, गो. राधालाल जू की मंगल बधाई, पृ. सं. 233
गोस्वामी श्री हित राधालाल जी हर समय श्री श्यामाश्याम को प्रेम-पूर्वक लाड़ लड़ाते। उनके वस्त्राभूषण एवं राग-भोग की सेवा का बड़े प्रेम-पूर्वक पालन करते।
आध्यात्मिक जीवन :
वयस्क होने पर गो. श्री हित राधालाल जी ने अपने विद्वत्ता पूर्ण उपदेशों द्वारा बहुत से विमुखजनों का मान मर्दन करके उन्हें हित-मार्ग की ओर उन्मुख किया। प्रीतमदास जी ने इनकी स्वरूप परिचयात्मक छप्पै में इस तथ्य को सुस्पष्ट करते हुए लिखा है कि -
गोस्वामी-सिर-मुकुट, जयति श्रीराधालाला।
श्रीहित-पद दृढ़ विश्वास, धर्यौ पद-पंकज भाला॥
विमुखजननि-मुख भंजि, सरन हित-मारग आने।
शंके नहिं जिय नैंक, राधिकाबल्लभ गाने॥
सरनपाल निर्मल हृदय, 'हित प्रीतम' निज सरन लिय।
श्रीहरिवंश-मयंक-कुल, धन्य उजागर ओप दिय॥
- प्रीतमदास जी, हित चन्द्र प्रकाश, गो. राधालाल जू की मंगल बधाई, पृ. सं. 210
गोस्वामी श्री हित राधालाल जी की जय हो, जिन्होंने विमुखजनों को हित मार्ग में आरूढ़ किया। उन्हें किसी से भय न था, सदैव श्री राधावल्लभ जी का गान करते। शरणागत वत्सल, निर्मल ह्रदय श्री गोस्वामी जी ने मुझे अपनी शरण में ले लिया। श्रीहरिवंश कुल में प्रगट होनेवाले गोस्वामी श्री हित राधालाल जी धन्य हैं।
गो. जुगलबल्लभ जी के शिष्य श्रीहितदास जी ने वि. सं. 1906 में रचित 'रसिक लता' नाम्नी हित मालिका की टीका में गो. श्री हित राधालाल जी को अपने पिता श्रीगोवर्धनलाल जी के साथ विराजमान बतलाया है -
"श्रीरासविहारीलाल जी के पुत्र श्रीजुगललाल जी; तिनके दोय पुत्र श्रीगोवर्द्धनलाल जी बड़े, श्रीछोटेलाल जी छोटे। बड़े श्रीगोवर्द्धनलाल जी के रचित वर्षोत्सव के पद मन हरन हैं। श्रीगोवर्द्धनलाल जी के पुत्र गो. श्री हित राधालाल जी। श्रीछोटेलाल जी लघु भ्राता के पुत्र गो. श्रीहर्षलाल जी। ये दोउ पिता अरु दोउ पुत्र विराजमान हैं।”
- हितदास जी, रसिकलता पृ. स. 137
वृन्दावन विरह :
जन्मकाल से ही वृन्दावन-रज का सेवन करने वाले गो. श्री हित राधालाल जी को एक समय किसी कारणवशात् वृन्दावन सीमा से बाहर टोड़ी फतेहपुर भी जाना पड़ा। वहाँ अधिक समय व्यतीत होने पर गोस्वामी जी के हृदय से निकली वृन्दावन - विरह वेदना की टीस उनके हृदयस्थ श्रीवनानुराग को प्रकट करती है -
कब करि हौ कृपा मनाउँ चरन की सेवा।
श्रीवृन्दाविपिन बसाउ तुमहीं सुधि लेवा ॥
अब वेगहिं सुधि करि लेहु दया के दाता।
हम पड़े पहाड़नि बीच प्राण अब जाता ॥
अपनी ही कृपा करि वेगि, पास गहि लीजै ।
'श्रीराधालाल' हित रूप रंग में भींजै॥
- गो. श्री हित राधालाल जी, वर्षोत्सव छब्बीसी (12)
हे श्री राधावल्लभ, कब आपकी कृपा होगी, कब मैं आपके चरणों की सेवा करूँगा? मुझे श्री वृन्दावन बुला लीजिये, हे दया के दाता, मैं यहाँ पहाड़ों में पड़ा हूँ, प्राण निकलने को है, कृपा कर अपने पास बुला लीजिये, एवं अपने प्रेम रंग से मुझे अभिसिक्त कीजिये।
गो. श्री हित राधालाल जी ने टोड़ी फतेहपुर के किले में विराजमान ठाकुर श्रीजुगलकिशोर जी की पावसीय प्रभा का वर्णन भी एक पद में किया है -
आज अति शोभा श्रीहित माँहिं।
ठाढ़े युगलकिशोर जोर सँग, टोड़ी फतेपुर छाँहिं॥
जल - वरषा झुकि आई चहुँदिशि, शोभित किले सरसाँहिं।
रूप-घटा की छटा मँहि श्रीहित निकुंजअली (गो. किशोरीलाल जी की शिष्या, टोड़ी
फतेहपुर की रानी थीं, परम आसक्त रसिक) ढिंग जाँहि॥
- गो. श्री हित राधालाल जी, वर्षोत्सव छब्बीसी (16)
युगल किशोर यहाँ तोड़ी फतेहपुर के किले में विराजमान हैं, जिनकी शोभा अवर्णनीय है। चारों ओर से वर्षा के जल किले के भीतर आ रहे हैं एवं एवं श्री श्यामाश्याम अपने रूप की छटा बिखेरते हुए श्री हित निकुंजअली के पास जाते हैं।
रचना :
अभिनव अनुसन्धान के फलस्वरूप इनकी 'वर्षोत्सव छब्बीसी पद बन्ध' नामक एक रचना श्रीहित राधागोपाल मन्दिर, कोलारस (मध्य प्रदेश) से प्राप्त हुई है। इस रचना में 26 पदों में सम्पूर्ण वर्षोत्सव का वर्णन किया गया है, जिसमें नित्य और नैमित्तिक दोनों प्रकार की औत्सविक रचनायें समाहित हैं। यह प्राचीन प्रति गो. श्री हित राधालाल जी के ही शिष्य राधिकाशरण जी प्रसिद्ध नाम 'संतदास' जी द्वारा 1914 में प्रतिलिपि की गई है। इस आधार पर 'वर्षोत्सव छब्बीसी' का रचनाकाल 1914 से पूर्व ही निश्चित होता है।
गो. श्री हित राधालाल जी द्वारा बसंत एवं होली के पद :
(राग बसन्त)
कैसौ अद्भुत रूप प्रगट भयौ, सजनी आजु बसन्त।
राधे-रूप निहारत प्यारौ, ललिता जू दृगनि हसन्त॥
केशरिया सब अंग सुहायौ, सारी उर तें खसन्त।
शोभा हित जू वन पर छाई, दृग 'राधालाल' धसन्त॥
- गो. श्री हित राधालाल जी, वर्षोत्सव छब्बीसी पद बन्ध (1)
हे सखी, आज इस वसंत ऋतू में कैसा अद्भुत रूप प्रकट हुआ है, श्री कृष्ण श्री राधा को निहार रहे हैं, श्री ललिता जू नेत्र हर्षित हो रहे हैं। जुगल किशोर के समस्त अंग केसरिया रंग से अनुरंजित हैं, वन की अद्भुत शोभा बानी है, जिसकी झलक मेरे नेत्रों में समां गयी है।
(राग काफी)
लाल रंग भरि खेलत होरी।
इत डफ - ढोल - पखावज बाजत, झाँझ-वीन रँग- बोरी॥
इत पिचकारी तकिकैं मारत, प्यारी गुलाल कर झोरी।
फाग-सुहाग झलक दृग ढरकै, 'हित राधालाल' की ओरी॥
- गो. श्री हित राधालाल जी, वर्षोत्सव छब्बीसी पद बन्ध (2)
श्री कृष्ण रंग भरकर होली खेल रहे हैं। एक ओर डफ,ढोल एवं पखावज बज रहा है और दूसरी ओर झाँझ-वीणा रंग में रंगे हैं। श्री कृष्ण देख-देख कर पिचकारी मारते हैं एवं श्री राधा हाथों से गुलाल लगातीं हैं। मेरे समक्ष श्री श्यामाश्याम की इस होली लीला की झलक दिखलाई दे रही है।
रसिया एवं डोल के पद :
तेरी मूरति राधा वर प्यारी ।
संग लियैं सब सखा समाजी, रंग भरनि की छबि न्यारी॥
इत ब्रजनारि सभी गोरी-सँग, भींजि गई फूलनि क्यारी।
राधालाल की बाँह पकरिकैं, गुलचा मुख दीनी उच्चारी॥
- गो. श्री हित राधालाल जी, वर्षोत्सव छब्बीसी पद बन्ध (3)
राधावर श्री कृष्ण की छबि बड़ी प्यारी है। संग में सब सखा समाज है जो पिचकारियों में रंग भरकर उपस्थित है, जिसकी छवि न्यारी है। जैसे ही श्री राधा संग सखियाँ आयीं वैसे ही पिचकारी के रंग से उनके संग पुष्पों का वन भी भीग गया। श्री राधा ने श्री कृष्ण की बाँह पकड़कर उनके गालों पर "हो-हो-हो-हो-होरी है" उच्चारण कर प्रेम भरा हल्का घूंसा मारती हैं।
(राग सारंग)
झूलत डोल गुलाबी रंग में।
प्यारी- छबि देखनि दृग अटक्यौ, श्रीहित लाल झुलावै संग में॥
सारँग' स्वर सहचरि मिलि गावति, बाजत साज सजे मुँहचंग में।
सोभा देखि हृदय उपट्यौ, 'हित राधालाल' के नैंन उमंग में॥
- गो. श्री हित राधालाल जी, वर्षोत्सव छब्बीसी पद बन्ध (4)
श्री श्यामा जू गुलाबी रंग के झूले में झूल रहे हैं। उनकी छवि के दर्शन करने हेतु श्री कृष्ण के नेत्र उन्हीं पर ठीके हैं एवं वे श्री राधा को झूला रहे हैं। सखियाँ सारंग राग में मधुर गीत गा रही हैं एवं विभिन्न वाद्य यंत्रों क बजा रही हैं। इस छवि की शोभा देखकर मेरा ह्रदय व्याकुल हो रहा है, नैन उमंग से भर गए हैं।
दिव्य वृन्दावन की उत्कंठा :
श्रीव्यास मिश्र के लाल! अरज सुनि लीजै।
मो अधम कुटिल की ओर दृगनि धरि दीजै॥
हम कियौ कहा अपराध फिरैं रँग भूले।
तुम से उदार पर सदा, चित्त में फूले॥
कब करि हौ कृपा मनाऊँ चरन की सेवा।
श्रीवृन्दाविपिन बसाउ तुमहीं सुधि लेवा॥
- गो. श्री हित राधालाल जी, वर्षोत्सव छब्बीसी पद बन्ध (12)
हे व्यास मिश्र के पुत्र श्री हरिवंश, मेरी विनती सुन लीजिये। मुझ अधम एवं कुटिल की ओर अपनी करुणा दृष्टि कीजिये। मुझसे कौनसा अपराध हो गया है जो आप मुझे भूल गए हैं। आप के जैसे उदार के शरणागत होने के कारण मैं ह्रदय से फूला रहता हूँ। कब आप मुझपर कृपा कर अपनी चरण-सेवा प्रदान करेंगे ? अब आप ही मुझपर कृपा कीजिये एवं मुझे दिव्य वृन्दावन में बसा लीजिये।
श्रीलाड़िलीजू की जनम बधाई :
(राग सारंग)
भैया आज वरसानौं सुखदाई।
जनम लियौ कीरति रानी कैं, रावलि बजी बधाई॥
ह्याँ श्रीहितजू लाड़ लड़ाये, राधा प्रगट दिखाई।
'राधालाल हित' या उत्सव में हित सरनागत निधि पाई।
- गो. श्री हित राधालाल जी, वर्षोत्सव छब्बीसी पद बन्ध (19)
आज बरसाने में सुख की वर्षा हो रही है। रावल में बधाई बज रही है, श्री कीरति महारानी के महल में श्री राधा का जन्म हुआ है। यहाँ श्री हरिवंश महाप्रभु ने श्री राधा को प्रकट में लाड़ लड़ाया है। इस जन्मोत्सव में श्री हित जी महाराज के शरणागतों को अमूल्य निधि प्राप्त हुई है।
निकुंज गमन :
साम्प्रदायिक विद्वद्जनों एवं वयोवृद्धजनों के मुख से ऐसा कहते हुए सुना गया है कि गो. श्री हित राधालाल जी अपने पिताश्री गो. गोवर्द्धलाल जी के जीवन काल में ही निकुंजगामी हो गये थे। इस आधार पर गोस्वामी श्री हित राधालाल जी अनुमानतः 1910 के लगभग निकुंज पधारे।

