रहौं मैं सदा जुगल-भुज छहियाँ - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेन्दु ग्रंथावली, प्रेम फुलवारी (78)

रहौं मैं सदा जुगल-भुज छहियाँ - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेन्दु ग्रंथावली, प्रेम फुलवारी (78)

रहौं मैं सदा जुगल-भुज छहियाँ।
अब मत छाँड़ौ राधा मोहन पकरि दीन को बहियाँ॥ [1]
सदा बसाओ श्री वृंदावन नित नव कुंजन महियाँ।
'हरीचंद' इक-रूप निबाहौ अब पन बिगरै नहियाँ॥ [2]

- श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेन्दु ग्रंथावली, प्रेम फुलवारी (78)

हे श्री राधा कृष्ण, मैं सदैव आपके भुजाओं की छाया में रहना चाहता हूँ, अब मेरा त्याग न कीजिये, मुझ दीन की बाँह पकड़ लीजिये। [1]

मुझे सदैव श्री वृन्दावन के नित्य नवकुंज में निवास दीजिये। श्री हरिचंद कहते हैं कि "हे श्यामाश्याम, शरण में आये हुए की रक्षा करने के अपने प्रण का निर्वाह कीजिये, इसे असत्य न होने दीजिये।"