दीपक पीर न जानई - श्री सूरदास, सूर सागर

दीपक पीर न जानई - श्री सूरदास, सूर सागर

दीपक पीर न जानई, पावक परत पतंग।
तनु तो तिहि ज्वाला जरयो, चित न भयो रस भंग॥

- श्री सूरदास, सूर सागर

एक दीपक को पतंग की पीड़ा का अनुभव नहीं है, परंतु पतंगा दीपक के दीये की लौ से प्रेम करके प्रेम में जलकर भस्म हो जाता है। उस पतंगे का शरीर तो ज्वाला में जल कर भस्म हो जाता है परंतु उसका प्रेम (रस) नष्ट नहीं होता।