साधन आन कोटि तप तीरथ - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के कवित्त-सवैया (62)

साधन आन कोटि तप तीरथ - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के कवित्त-सवैया (62)

(सवैया)
साधन आन कोटि तप तीरथ
कहा भयौ भजन उदै बिनु भांन। [1]
पण्डित पढ़ पढ़ाइ सब बहके
ज्यों भड़िहा भटकत निसि स्वाँन॥ [2]
श्रीविहारिनदासि बिनु बनिक
बनजई फूलत कृपन दै दांन। [3]
रसिकन कौ रस खेत हेत तजि
ये गये कूर कुरुखेत न्हांन॥ [4]

- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के कवित्त-सवैया (62)

कोटि कोटि साधन, तप, तीरथ आदि करने से क्या लाभ यदि भक्ति रूपी सूर्य का ह्रदय में उजाला ही नहीं हो रहा । [1]

भक्ति से विहीन होकर, अन्य साधन में लग लग कर पंडित पढ़ पढ़ कर ऐसे बहक गये हैं मानो कुत्ता रात्रि में बेकार ही में भटकता हुआ फिरे । [2]

लोग दान आदि दे दे कर फलों की आशा से ऐसे प्रसन्न होते हैं, मानो कोई लालची बनिया व्यापार में धन कमाकर फूला फूला फिरता है । [3]

ऐसे स्वार्थी दुष्ट लोग ही रसिकों के रसखेत साक्षात श्री वृंदावन धाम को त्याग कर कुरुक्षेत्र में नहाने चले जाते हैं । [4]