इस स्थान पर श्री राधा कृष्ण की होली लीला हुई है, गुलाल के रंग से कुण्ड का जल लाल हो गया था, इसी कारण इस कुण्ड का नाम गुलाल कुण्ड हुआ।
लीला :
श्री नरहरि चक्रवर्ती ठाकुर अपने 'भक्ति रत्नाकर' ग्रन्थ में वर्णन करते हैं की -
ए हेतु गांठोली- ए गुलाल कुण्ड जले।
एबे फाग देखे लोक वसन्तेर काले॥
- श्री नरहरि चक्रवर्ती ठाकुर, भक्ति रत्नाकर
यहाँ राघव पंडित ने श्रीनिवास को बताया कि गांव का नाम गंथुली कैसे पड़ा। उन्होंने कहा: "वसंत ऋतु में श्री राधा और श्री कृष्ण यहां अपने सिंहासन पर विराजमान थे। सखियों ने गुप्त रूप से पीछे जाकर श्री श्यामाश्याम के वस्त्रो को जोड़कर उसमें गाँठ लगा दी। इसीलिए इस गाँव का नाम गंथुली रखा गया। जब श्री श्यामाश्याम सिंहासन से उठे और आगे बढे तो वस्त्रों में गाँठ के कारण लड़खड़ाकर आलिंगनबद्ध हो गए।
इस दृश्य को देखकर सखियाँ प्रसन्न हो हँसते हुए ताली बजाने लगीं। यह देख युगल किशोर संकुचित हो गए। तब सखियों से वस्त्र के गाँठ खोले और उनपर गुलाल उड़ाया। सखियों ने इतना गुलाल उड़ाया की आकाश गुलाल रंग से छा गया। उस गुलाल के कारण कुण्ड का जल लाल हो गया एवं उसे गुलाल कुण्ड कहा जाने लगा।
अब भी हर वसंत ऋतु में इस कुण्ड का जल गुलाल से भर जाता है एवं जल लाल रंग का हो जाता है।
श्री राघवदास जी का प्रसंग :
'252 वैष्णवों की वार्ता' के अनुसार अष्टछाप के महाकवि श्री चतुर्भुजदास जी के सुपुत्र श्री राघवदास जी को श्री राधाकृष्ण की होली लीला का यहाँ दर्शन हुआ। उस लीला का वर्णन करते हुए उन्होंने इस धमार का गायन किया -
ए जाय जहाँ हरि खेले गोपिन संगा।
- श्री राघवदास जी
इसका गान करते-करते उनका देहावसान हो गया तब धमार उनकी पुत्री ने पूरी की।
यहाँ श्री शिव जी का मंदिर है जहाँ गुलाल कुण्ड महादेव विराजमान हैं। समीप में ही महाप्रभु श्री वल्लभाचार्य जी की बैठक है।
स्थान :
गुलाल कुण्ड गोवर्धन के गांठोली ग्राम के पास ही राजमार्ग पर बाईं ओर स्थित है।
लीला :
श्री नरहरि चक्रवर्ती ठाकुर अपने 'भक्ति रत्नाकर' ग्रन्थ में वर्णन करते हैं की -
ए हेतु गांठोली- ए गुलाल कुण्ड जले।
एबे फाग देखे लोक वसन्तेर काले॥
- श्री नरहरि चक्रवर्ती ठाकुर, भक्ति रत्नाकर
यहाँ राघव पंडित ने श्रीनिवास को बताया कि गांव का नाम गंथुली कैसे पड़ा। उन्होंने कहा: "वसंत ऋतु में श्री राधा और श्री कृष्ण यहां अपने सिंहासन पर विराजमान थे। सखियों ने गुप्त रूप से पीछे जाकर श्री श्यामाश्याम के वस्त्रो को जोड़कर उसमें गाँठ लगा दी। इसीलिए इस गाँव का नाम गंथुली रखा गया। जब श्री श्यामाश्याम सिंहासन से उठे और आगे बढे तो वस्त्रों में गाँठ के कारण लड़खड़ाकर आलिंगनबद्ध हो गए।
इस दृश्य को देखकर सखियाँ प्रसन्न हो हँसते हुए ताली बजाने लगीं। यह देख युगल किशोर संकुचित हो गए। तब सखियों से वस्त्र के गाँठ खोले और उनपर गुलाल उड़ाया। सखियों ने इतना गुलाल उड़ाया की आकाश गुलाल रंग से छा गया। उस गुलाल के कारण कुण्ड का जल लाल हो गया एवं उसे गुलाल कुण्ड कहा जाने लगा।
अब भी हर वसंत ऋतु में इस कुण्ड का जल गुलाल से भर जाता है एवं जल लाल रंग का हो जाता है।
श्री राघवदास जी का प्रसंग :
'252 वैष्णवों की वार्ता' के अनुसार अष्टछाप के महाकवि श्री चतुर्भुजदास जी के सुपुत्र श्री राघवदास जी को श्री राधाकृष्ण की होली लीला का यहाँ दर्शन हुआ। उस लीला का वर्णन करते हुए उन्होंने इस धमार का गायन किया -
ए जाय जहाँ हरि खेले गोपिन संगा।
- श्री राघवदास जी
इसका गान करते-करते उनका देहावसान हो गया तब धमार उनकी पुत्री ने पूरी की।
यहाँ श्री शिव जी का मंदिर है जहाँ गुलाल कुण्ड महादेव विराजमान हैं। समीप में ही महाप्रभु श्री वल्लभाचार्य जी की बैठक है।
स्थान :
गुलाल कुण्ड गोवर्धन के गांठोली ग्राम के पास ही राजमार्ग पर बाईं ओर स्थित है।

