रे मन मान कही इक मेरी - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, विनय (31)

रे मन मान कही इक मेरी - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, विनय (31)

(राग खट)
रे मन मान कही इक मेरी।
चूर-चूर ह्वै व्रजरज मिलजा, यामें शोभा तेरी॥ [1]
क्यों सोवत अज्ञाननींद में यह चलिवे की बेरी।
ललित लड़ैती जाग युगल भज, अब न लगा बहु देरी॥ [2]

- श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, विनय (31)

हे मन, मेरा कहना मान ले। तू चूर-चूर होकर ब्रजरज में मिलजा, इसी में तेरी शोभा है। [1]

श्री ललित लड़ैती जी कहते हैं कि "रे मन, क्यों अज्ञान की नींद में सो रहा है, अब जाने का समय आ गया है, जाग जा एवं युगल किशोर श्री श्यामाश्याम का भजन कर, अब और देरी न कर।" [2]