राधे मोहे ब्रज को बनइयो मोर - ब्रज के लोकगीत

राधे मोहे ब्रज को बनइयो मोर - ब्रज के लोकगीत

राधे मोहे ब्रज को बनइयो मोर, नाचूँ ता ता थई। [1]
चाहे मोहे कुंजन को बन्दर बनइयो।
बन्दर भी निधुवन के अन्दर बनइयो॥
मेरी विनती है कर जोर, नाचूँ ता ता थई।  [2]
चाहे मुझे धुरहू बनइयो वृन्दावन की॥
बनइयो श्री वृन्दावन की बिहारी के चरण की।
जहाँ खेले नित्यकिशोर - नाचूँ ता ता थई॥ [3]
चाहे मुझे कुंजन की लता बनइयो।
चाहे मुझे कंकड़ या पत्थर बनइयो॥
गोकुल को बनइयो ढ़ोर - नाचूँ ता ता थई। [4]
चाहे घुंघरू बनइयो चाहे पायल बनइयो॥
अपने ही रस का पागल बनइयो।
मैं तो बंध्यो प्रेम की डोर - नाचूँ ता ता थई॥ [5]
- ब्रज के लोकगीत

हे श्री राधे, मुझे ब्रज का मोर बना दो, मैं ता-ता-थेई ताल पर नृत्य करूँगा। [1]

हे श्री राधे, मुझे चाहे बन्दर बनाओ तो निधुवन के भीतर का बन्दर ही बनाओ, मेरी आपसे यही विनती है। [2]

हे श्री राधे, चाहे मुझे धूल बनाओ लेकिन वृन्दावन की धूल ही बनाना, जहाँ नित्य किशोर श्री श्यामाश्याम क्रीड़ा करते हैं, एवं मुझे श्री बिहारी जी के चरणों की धूल बनने का सौभाग्य प्राप्त होगा। [3]

हे श्री राधे, मुझे वृन्दावन की कुञ्ज की लता बना दो, या मुझे वहाँ का कंकड़ अथवा पत्थर बना दो, या मुझे गोकुल की गाय ही बना दो। [4]

हे श्री राधे, मुझे चाहे घुँघरू बनाओ अथवा पायल बनाओ, लेकिन अपने ही प्रेम का पागल बनाना, मैं तो प्रेम की डोर में बंध गया हूँ। [5]