नादी नृत्य निपुन बहु बांदी, स्वादी मिल्यौ न कोई।
श्रीनागरीदासि अनन्य बिन, सब गये चतुर गथ खोई॥
- श्री नागरीदेव जी, श्री नागरीदेव जी की वाणी, साखी (12)
शब्दों की चातुरी द्वारा वाद विवाद (बहस) करने वाले तो बहुत मिले, परंतु रस का वास्तविक स्वादी (रसिक) एक भी न मिल सका । हे नागरीदास! सहचरी भाव के दृढ़ अनन्य बने बिना, बड़े बड़े चतुर व्यक्ति, परमार्थ की विशुद्ध वस्तु को प्राप्त किए बिना ही चले गये ।
श्रीनागरीदासि अनन्य बिन, सब गये चतुर गथ खोई॥
- श्री नागरीदेव जी, श्री नागरीदेव जी की वाणी, साखी (12)
शब्दों की चातुरी द्वारा वाद विवाद (बहस) करने वाले तो बहुत मिले, परंतु रस का वास्तविक स्वादी (रसिक) एक भी न मिल सका । हे नागरीदास! सहचरी भाव के दृढ़ अनन्य बने बिना, बड़े बड़े चतुर व्यक्ति, परमार्थ की विशुद्ध वस्तु को प्राप्त किए बिना ही चले गये ।

