सुनि विनती मेरी श्री राधे - श्री अनन्य अलि जी

सुनि विनती मेरी श्री राधे - श्री अनन्य अलि जी

सुनि विनती मेरी श्री राधे।
तिहारी कृपा बिन दुर्लभ सबकौं श्रीव्याससुवन जू क्यौंहुँ न लाधे॥ [1]
काहू सौं मन मानैं न मेरौ साधन भजन सबै दुख दाधे। 
अनन्यअली कौं अपनी जानिकैं श्री हरिवंश सुख देहु अबाधे॥ [2]
- श्री अनन्य अलि जी

हे श्री राधे, मेरी विनती सुनिए, आपकी कृपा के बिना, सबके लिए दुर्लभ, श्री व्यास नंदन (श्री हरिवंश जी) किसी को कैसे प्राप्त हो सकते हैं  ? [1]

किसी के भी साथ मेरा मन नहीं मिलता, समस्त भजन एवं साधन मुझे दग्ध करते रहे । श्री अनन्य अली जी कहते हैं कि "हे श्री राधे, तुम्हारी करुणा के कारण ही श्री हरिवंश महाप्रभु ने मुझे अपना जानकर, अखण्ड सुख (निजमहल की सेवा) प्रदान किया है" । [2]