सर्वे धर्माममाधर्माः सर्वसाधुमसाधु मे।
न यत्र लभ्यते राधे त्वत्पदाम्बुज-माधुरी॥
- श्री हित कृष्ण चंद्र, श्री राधा उपसुधा निधि (39)
हे राधे! जहां कहीं भी, यदि आपके श्री चरण कमलों की माधुरी वहाँ प्राप्त नहीं होती तो मेरे लिए वे सब धर्म अधर्म है, साधु असाधु हैं एवं साधुता असाधुता ही है ।
न यत्र लभ्यते राधे त्वत्पदाम्बुज-माधुरी॥
- श्री हित कृष्ण चंद्र, श्री राधा उपसुधा निधि (39)
हे राधे! जहां कहीं भी, यदि आपके श्री चरण कमलों की माधुरी वहाँ प्राप्त नहीं होती तो मेरे लिए वे सब धर्म अधर्म है, साधु असाधु हैं एवं साधुता असाधुता ही है ।

