धनि धनि वृंदावन के बासी - श्री किशोरी अलि, रसिक महिमा (6)

धनि धनि वृंदावन के बासी - श्री किशोरी अलि, रसिक महिमा (6)

(राग सारंग)
धनि धनि वृंदावन के बासी।
जिनकी करत प्रसंसा सुक मुनि, उद्धव बिधि कमलासी॥ [1]
आन देव की संक न मानत, संतत जुगल-उपासी।
बैकुंठहु की रुचै न संपति, कब मन आवै कासी॥ [2]
श्रीजमुना-जल रुचि सों अचवत, मुक्ति भई तहाँ दासी।
अष्ट-सिद्धि नव-निधि कर जोरे, जिनकी करत खवासी॥ [3]
जिनकै दरस-परस रस उपजत, हियै बसत रस-रासी।
श्री बंसी अंलि कृपा किसोरी, कछु इक महिमा भासी॥ [4]

- श्री किशोरी अलि, रसिक महिमा (6)

श्री वृंदावन के वासी धन्य हैं, जिनकी प्रशंसा स्वयं शुकदेव जी, उद्धव जी, ब्रह्मा जी, लक्ष्मी जी, आदि करते हैं। [1]

वृंदावन के वासी किसी भी अन्य देवी-देवता की शंका नहीं करते, सदैव युगल किशोर श्री श्यामाश्याम की उपासना में उन्मत्त रहते हैं। उन्हें वैकुण्ठ की भी परम संपत्ति भाती नहीं, तो मन में काशी आदि तीर्थ कैसे आएं? [2]

वृंदावनवासी गण श्री यमुना जल का प्रसन्नता पूर्वक आचमन करते हैं, जहाँ (श्री धाम वृंदावन में) मुक्ति भी दासी स्वरुप में है। अष्ट-सिद्धि एवं नवों निधियाँ हाथ जोड़कर जहाँ वृंदावन वासियों की सेवा में उपस्थित रहती हैं। [3]

वृंदावन वासिओं के दर्शन एवं स्पर्श से रस प्रकट होता है, ह्रदय में रस की राशि बस जाती है। श्री किशोरिअलि जी कहते हैं कि "मेरे गुरुदेव श्री वंशीअलि की कृपा से मैंने भी वृंदावन वासियों की कुछ महिमा जानी है।" [4]