अरी तू काहे अनमनी - श्री हरिराय जी

अरी तू काहे अनमनी - श्री हरिराय जी

(राग कान्हरो)
अरी तू काहे अनमनी बोलतनाहिं बुलायें।
अवलोंतो तू हसत खेलतही कहाभयो मोहिं आयें॥ [1]
नयन नीचें कियें चितवन रुखदियें तिरछि भ्रुंह चढायें।
रसिक प्रीतमपिय कबके ठाड़े विनवत हे परमायें॥ [2]

- श्री हरिराय जी

हे राधिका जू, तुम अचानक इतनी अनमनी क्यों हो गयी हो कि कृष्ण के पुकारने पर भी नहीं बोल रही हो ? अभी तक तो तुम हँस-खेल रही थी, बातें कर रही थी और मेरे पहुँचते ही तुम्हें क्या हो गया? [1]

नयनों को नीचे किये हुए, सबसे दृष्टि हटाकर, तिरछी भौहें चढ़ाये हुई हो । श्री हरिराय जी कहते हैं, "रसिक प्रियतम प्यारे जू कबसे खड़े हैं और तुम्हारे चरणों में बारंबार विनती कर रहे हैं ।" [2]