किस भांति छुएँ अपने कर सों - डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’

किस भांति छुएँ अपने कर सों - डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’

(सवैया)
किस भांति छुएँ अपने कर सों, पद पंकज है सुकुमार तेरा।
हरे कृष्ण बसा इन नयनन में, अति सुन्दर रूप उदार तेरा॥ [1]
नहीं और किसी की जरूरत है, हमको बस चाहिये प्यार तेरा।
तन पै, मन पै, धन पै, सब पै, इस जीवन पर अधिकार तेरा॥ [2]

- डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’

हे श्री कृष्ण, मैं आपके चरण-कमलों का स्पर्श अपने हाथों से कैसे करूँ, जो अति सुकुमार हैं? मेरी आँखों में आपका अत्यंत सुंदर और उदार रूप बसा हुआ है। [1]

मुझे किसी और की आवश्यकता नहीं, मुझे तो केवल आपके प्रेम की कामना है। डंडी स्वामी श्री हरेकृष्णानंद सरस्वती जी कहते हैं कि, हे श्री कृष्ण, मेरे तन, मन, और धन—सब पर एकमात्र आपका ही अधिकार है। [2]