कर्म धर्म और ज्ञान विज्ञान - श्री सरस देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (4)

कर्म धर्म और ज्ञान विज्ञान - श्री सरस देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (4)

कर्म धर्म और ज्ञान विज्ञान भक्ति न आन हृदै में आनौं।
वेद रमापति रामहिं आदि दै श्रीव्रजराजहिं कोउ जो बखानौं॥ [1]
अति दुर्लभ नित्य विहार हमारे जू श्रीहरिदास प्रगट प्रवानौं।
सरस सुसार विचारि बिहारिनिदासि बिना हौं विहार न जानौं॥ [2]
- श्री सरस देव जी, श्री सरस देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (4)

एक नित्य विहार का अनन्य उपासक कहता है कि कर्म, धर्म, ज्ञान, विज्ञान एवं नाना प्रकार की भक्ति को हम अपने ह्रदय में आने नहीं देते । और तो और वेद प्रतिपादित तत्व, साक्षात श्री वैकुण्ठनाथ, भगवान श्री राम, एवं श्री व्रजेंद्र नंदन श्री कृष्ण आदि भगवत स्वरूप का भी हम बखान नहीं करते । [1]

हमारे यहाँ तो श्री युगल [कुंज बिहारी एवं कुंज बिहारिनी] के अति दुर्लभ नित्य विहार रस की अखंड एवं अनन्य उपासना है जिसको साक्षात श्री स्वामी हरिदास जी ने ही जगत में प्रकट किया है । श्री सरसदेव जी कहते हैं कि यह तो गुरुदेव श्री बिहारिन देव जी की कृपा का ही परिणाम है कि उन्होंने हमें समस्त सारों के भी सार तत्व, इस विहार रस को भली भाँति परिचित करवाया । [2]