(राग रामकली)
जाकी है उपासना, ताहीकी वासना, ताहीकौ नाम, रूपलीला गुन गाइये। [1]
यहै अनन्य परम धर्म परिपाटी, वृंदावन बसि अनत न जाइये॥ [2]
सोई विभिचारी आन कहै, आन करै, ताकौ मुख देखे, दारुन दुख पाइयै। [3]
व्यास होइ उपहास त्रास कियें, आस-अछत, कित दास कहाइयै॥ [4]
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (179)
साधक को जिस इष्टदेव (श्री राधा कृष्ण) की उपासना प्राप्त है, उसे केवल उन्हीं को प्राप्त करने की इच्छा बनानी चाहिए। उन्हीं के नाम, रूप, लीला एवं गुणों का गान करना चाहिए। [1]
यही अनन्य धर्म का पारम्परिक मार्ग है, साधक को अखंड रूप से श्री वृन्दावन का वास करना चाहिए एवं वृन्दावन को छोड़ किसी और स्थान पर कभी नहीं जाना चाहिए। [2]
वही व्यभिचारी है जो अपने उपास्य तत्व के अतिरिक्त किसी अन्य की बात कहे, अन्य कुछ प्राप्त करने के लिए कोई कार्य करे। ऐसे पतित के तो मुख दर्शन से भी असहन दुःख प्राप्त होता है। [3]
श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि किसी भी देवी-देवता एवं अन्य किसी से भयभीत होने पर आप उपहास के पात्र ही बनेगें, किसी अन्य की आशा रखने से आप अपने इष्ट के अनन्य दास कैसे कहलायेंगे? [4]
जाकी है उपासना, ताहीकी वासना, ताहीकौ नाम, रूपलीला गुन गाइये। [1]
यहै अनन्य परम धर्म परिपाटी, वृंदावन बसि अनत न जाइये॥ [2]
सोई विभिचारी आन कहै, आन करै, ताकौ मुख देखे, दारुन दुख पाइयै। [3]
व्यास होइ उपहास त्रास कियें, आस-अछत, कित दास कहाइयै॥ [4]
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (179)
साधक को जिस इष्टदेव (श्री राधा कृष्ण) की उपासना प्राप्त है, उसे केवल उन्हीं को प्राप्त करने की इच्छा बनानी चाहिए। उन्हीं के नाम, रूप, लीला एवं गुणों का गान करना चाहिए। [1]
यही अनन्य धर्म का पारम्परिक मार्ग है, साधक को अखंड रूप से श्री वृन्दावन का वास करना चाहिए एवं वृन्दावन को छोड़ किसी और स्थान पर कभी नहीं जाना चाहिए। [2]
वही व्यभिचारी है जो अपने उपास्य तत्व के अतिरिक्त किसी अन्य की बात कहे, अन्य कुछ प्राप्त करने के लिए कोई कार्य करे। ऐसे पतित के तो मुख दर्शन से भी असहन दुःख प्राप्त होता है। [3]
श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि किसी भी देवी-देवता एवं अन्य किसी से भयभीत होने पर आप उपहास के पात्र ही बनेगें, किसी अन्य की आशा रखने से आप अपने इष्ट के अनन्य दास कैसे कहलायेंगे? [4]

