हौं बूड़न कौं बहु करौं - श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी (39)

हौं बूड़न कौं बहु करौं - श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी (39)

हौं बूड़न कौं बहु करौं, हरि नहिं बूड़न देहिं।
ज्यौं-ज्यौं उझकौं कूप में, त्यौं-त्यौं कर गहि लेहिं॥

- श्री ललितमोहिनी देव, श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी (39)

मैं तो इस संसार में डूबना का ही काम कर रहा हूँ, परंतु श्री हरि मुझे डूबने नहीं देते । जब जब मैं इस संसार रूपी कुएँ में गिरने लगता हूँ तब वे मुझे हाथ पकड़कर स्वयं साध लेते हैं ।