(राग रामकली)
मोकों बल है दोऊ ठौर कौ।
इक बल मोकों हरि-भक्तनि कौ दूजै नंद-किसोर कौ॥ [1]
मन क्रम वचन इहै ब्रत लीनों नाहिं भरोसौ और कौ।
"छीत-स्वामी" गिरिधरन श्रीविट्ठल श्रीवल्लभ सिरमौर कौ॥ [2]
- श्री छीत स्वामी
मेरा बल केवल दो ठौर में है । एक बल श्री हरि भक्तों का है और दूसरा बल नंदनंदन श्री कृष्ण चन्द्र का है । [1]
मैंने मन, कर्म और वचनों से यही व्रत लिया है कि इन दोनों के अतिरिक्त किसी अन्य का भरोसा नहीं रखूँगा । श्री छीत स्वामी कहते हैं कि गिरिधर लाल एवं वल्लभ कुल के सिरमौर श्री विट्ठल नाथ की कृपा का आसरा है । [2]
मोकों बल है दोऊ ठौर कौ।
इक बल मोकों हरि-भक्तनि कौ दूजै नंद-किसोर कौ॥ [1]
मन क्रम वचन इहै ब्रत लीनों नाहिं भरोसौ और कौ।
"छीत-स्वामी" गिरिधरन श्रीविट्ठल श्रीवल्लभ सिरमौर कौ॥ [2]
- श्री छीत स्वामी
मेरा बल केवल दो ठौर में है । एक बल श्री हरि भक्तों का है और दूसरा बल नंदनंदन श्री कृष्ण चन्द्र का है । [1]
मैंने मन, कर्म और वचनों से यही व्रत लिया है कि इन दोनों के अतिरिक्त किसी अन्य का भरोसा नहीं रखूँगा । श्री छीत स्वामी कहते हैं कि गिरिधर लाल एवं वल्लभ कुल के सिरमौर श्री विट्ठल नाथ की कृपा का आसरा है । [2]

