अहो निकुंज विहारिनि रानि।
अलबेली मद छकी रहो नित, सुन्दरता की खानि॥ [1]
हम तुम्हरी, तुम मेरी स्वामिनि यह सम्बन्ध सयानि।
कृपा संभारि संभारे रहियो, मैं तो अतिहि अयानि॥ [2]
नयनन में तुव रूप नाम मुख, मन चरनन रति भानि।
ज्यों निज दिव्य सहेलनि को, जांचत हौं सकुचानि॥ [3]
केलि कला करुनानिधि प्यारी, यह प्रतीत जिय आनि।
'नरहरि अलि' अवलोकि ललित मुख, फूली हिय न समानि॥ [4]
- श्री नरहरि अली
हे निकुंज विहारिणी, महारानी श्री राधा, आप नित्य ही प्रेम रस में छकी हुई ऐसी अलबेली सरकार हैं जो सुन्दरता की अगाध खान हैं। [1]
मैं आपकी दासी हूँ, आप मेरी स्वामिनी हो, यह सम्बन्ध अनादि है। आपकी कृपा ने ही मुझे सम्भाल रखा है (अथवा आगे भी सम्भालेगी), वस्तुत: मेरे में तो कोई बल नहीं, मैं तो अति ही बुद्धिहीन हूँ। [2]
मेरे नेत्रों में आपकी रूप माधुरी बसी रहे है, मुख में आपका हो, और मन सदा आपके चरण कमलों में लगा रहे । आपकी निज सखी स्वरुप को प्राप्त करने की लालसा लिए, आपसे संकोच सहित याचना करता हूँ। [3]
हे प्यारी जू, आप केली रस को बरसाने वाली हो, आप करूणा की अगाध सीमा हो, मेरे ह्रदय में तो यही अटूट विश्वास है । श्री नरहरि अली जी कहते हैं कि, हे श्री राधे! आपके मुख कमल का अवलोकन कर मेरा ह्रदय फूला नहीं समाता अर्थात रस से छलक रहा है। [4]
अलबेली मद छकी रहो नित, सुन्दरता की खानि॥ [1]
हम तुम्हरी, तुम मेरी स्वामिनि यह सम्बन्ध सयानि।
कृपा संभारि संभारे रहियो, मैं तो अतिहि अयानि॥ [2]
नयनन में तुव रूप नाम मुख, मन चरनन रति भानि।
ज्यों निज दिव्य सहेलनि को, जांचत हौं सकुचानि॥ [3]
केलि कला करुनानिधि प्यारी, यह प्रतीत जिय आनि।
'नरहरि अलि' अवलोकि ललित मुख, फूली हिय न समानि॥ [4]
- श्री नरहरि अली
हे निकुंज विहारिणी, महारानी श्री राधा, आप नित्य ही प्रेम रस में छकी हुई ऐसी अलबेली सरकार हैं जो सुन्दरता की अगाध खान हैं। [1]
मैं आपकी दासी हूँ, आप मेरी स्वामिनी हो, यह सम्बन्ध अनादि है। आपकी कृपा ने ही मुझे सम्भाल रखा है (अथवा आगे भी सम्भालेगी), वस्तुत: मेरे में तो कोई बल नहीं, मैं तो अति ही बुद्धिहीन हूँ। [2]
मेरे नेत्रों में आपकी रूप माधुरी बसी रहे है, मुख में आपका हो, और मन सदा आपके चरण कमलों में लगा रहे । आपकी निज सखी स्वरुप को प्राप्त करने की लालसा लिए, आपसे संकोच सहित याचना करता हूँ। [3]
हे प्यारी जू, आप केली रस को बरसाने वाली हो, आप करूणा की अगाध सीमा हो, मेरे ह्रदय में तो यही अटूट विश्वास है । श्री नरहरि अली जी कहते हैं कि, हे श्री राधे! आपके मुख कमल का अवलोकन कर मेरा ह्रदय फूला नहीं समाता अर्थात रस से छलक रहा है। [4]

