प्रातहीं किसोर जोरि कुंज-केलिनी - श्री विट्ठल विपुल देव जू की वाणी (7)

प्रातहीं किसोर जोरि कुंज-केलिनी - श्री विट्ठल विपुल देव जू की वाणी (7)

(राग भैरों)
प्रातहीं किसोर जोरि कुंज-केलिनी। [1]
अंग-अंग गुन-तरंग गौर-स्याम रूप-रासि,
मदन-केलि सुरत-सिंधु पुलकि-झेलिनी॥ [2]
तरनि नंदिनी-सुतीर, गावत पिक-भृङ्ग-कीर,
त्रिगुन मरुत-माधुरी, श्रमंबु पेलिनी। [3]
बरु बिहार-राजनी, सु नूपुरादि बाजनी,
श्रीबीठलविपुल बारनें भुज कंठ-मेलिनी॥ [4]

- श्री विठ्ठल विपुल देव जी, श्री विट्ठल विपुल देव जू की वाणी (7)

प्रातःकालीन सुरत रस-माधुरी का वर्णन करती हुई श्री विपुलबिहारिनदासी कहती हैं-

दिव्य युगल किशोर-किशोरी की जोड़ी कुंज-भवन में केलि-परायण है।[1]

रूप-राशि गौर-श्याम के अंग-प्रत्यंग से प्रेम रस जनित गुणों की तरंगें उद्दीप्त हो रही हैं। उस सुरत-सिंधु से मदन की केलि का निर्झरण हो रहा है, जिसका दर्शन कर सखीगण पुलकायमान हो रही हैं। [2]

कुंजभवन के निकट ही प्रवाहित श्रीयमुनाजी के तट पर पिक-भृंग-कीर आदि पक्षीगण श्रीयुगल के रस-यश का गायन कर रहे हैं। शीतल-मंद-सुगन्ध वायु की गतिशीलता श्रमकणों का परिहार कर रही है। [3]

इस श्रेष्ठ रस-विहार में सुशोभित प्रिया के चरणारविन्द के नपुरों का क्वणन हो रहा है। प्रियतम के कंठ में भुजा स्थापित की हुई प्रिया का अवलोकन करके हर्षातिरेक के कारण सखीगण न्यौछावर हो रही हैं। [4]