निज करनी सकुचें हिं कत सकुचावत इहिं चाल।
मोहूँ-से अति बिमुख त्यौं सनमुख रहि गोपाल॥
- श्रीमहाकवी बिहारी लाल, बिहारी सतसई (705)
हे गोपाल, मैं तो अपनी ही करनी से लजा गया हूँ, फिर तुम अपनी इस चाल से मुझे क्यों लजवा रहे हो कि मुझ-जैसे अत्यन्त विमुख के तुम सम्मुख रहते हो-(मैं तुम्हें सदा भूला रहता हूँ, और तुम मुझे सदा स्मरण रखते हो!)
मोहूँ-से अति बिमुख त्यौं सनमुख रहि गोपाल॥
- श्रीमहाकवी बिहारी लाल, बिहारी सतसई (705)
हे गोपाल, मैं तो अपनी ही करनी से लजा गया हूँ, फिर तुम अपनी इस चाल से मुझे क्यों लजवा रहे हो कि मुझ-जैसे अत्यन्त विमुख के तुम सम्मुख रहते हो-(मैं तुम्हें सदा भूला रहता हूँ, और तुम मुझे सदा स्मरण रखते हो!)

