(राग अहीर भैरव, त्रिताल)
अब हम राधे चरण अली।
जित ले जावे उत ही जाऊँ, अब तो गई छली ॥ [1]
रहूँ फूल बन सदा सेज पे, मानो कुसुम कली ।
श्रीगोपालहित हरी स्वामिनी, देत असीस चली ॥ [2]
- श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (120)
अब हम राधे चरण अली।
जित ले जावे उत ही जाऊँ, अब तो गई छली ॥ [1]
रहूँ फूल बन सदा सेज पे, मानो कुसुम कली ।
श्रीगोपालहित हरी स्वामिनी, देत असीस चली ॥ [2]
- श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (120)
अब मैं श्री राधा चरणों में पूर्ण रूप से आश्रित हो चुकी हूँ । वे मुझे जहां भी ले जायेंगीं, मैं वहीं चल दूँगी; अब मैं उनके द्वारा छली जा चुकी हूँ । [1]
एक कुसुम की खिली हुई कली की तरह मैं उनकी शैया पर फूल बन कर पर सदा विराजमान रहूँगी । श्री हित गोपाल दास जी श्री हरि की स्वामिनी श्री राधा को आशीष दे रहे हैं । [2]

![अब हम राधे चरण अली - श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (120)](https://images.brajrasik.org/65b51d2a00dd4b0008d826c1-m.jpeg)