राग द्वेष हमरे नहीं, नहीं देह अभिमान।
नित्त प्रिया मिलि भाव सों, ललित सु रसिक सुजान॥
- श्री ललितकिशोरी देव, श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (309)
ललित रस के जो सुजान रसिक होते हैं उनके राग द्वेष एवं देहाभिमान लेशमात्र भी नहीं होता क्योंकि वे तो सदाकाल अपने सरस भाव द्वारा श्री प्रिया जू (श्री राधा) से ही मिले रहते हैं।
नित्त प्रिया मिलि भाव सों, ललित सु रसिक सुजान॥
- श्री ललितकिशोरी देव, श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (309)
ललित रस के जो सुजान रसिक होते हैं उनके राग द्वेष एवं देहाभिमान लेशमात्र भी नहीं होता क्योंकि वे तो सदाकाल अपने सरस भाव द्वारा श्री प्रिया जू (श्री राधा) से ही मिले रहते हैं।

