(राग धनाश्री व जंगला)
जापै कृपा कर श्रीराधा, सोइ बास वृन्दावन पावै।
दिव्य अलौकिक भूमि सुहावन, दम्पति को निज धाम कहावे॥ [1]
शिव ब्रह्मादिक रज को तरसै, वेद पुराण विमल जस गावै।
"रूपमाधुरी” बिना कृपा के, एक पलक यहाँ रहि न सकावै॥ [2]
- श्री रूपमाधुरी जी, श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (140)
जिस पर श्री राधा कृपा करतीं हैं केवल उसे ही श्री वृन्दावन का वास प्राप्त होता है। श्री वृन्दावन दिव्य एवं अलौकिक है, यहाँ की भूमि सुहावनी है, जो युगल दम्पति श्री श्यामाश्याम का निज धाम कहलाता है। [1]
श्री वृन्दावन के रज के लिए शिव, ब्रह्मादिक भी तरसते हैं, जिसके विमल यश का गान वेद, पुराण, आदि करते हैं । श्री रूपमाधुरी जी कहते हैं कि "श्री राधा की कृपा के बिना कोई एक क्षण भी श्री धाम वृन्दावन में रह नहीं सकता।" [2]
जापै कृपा कर श्रीराधा, सोइ बास वृन्दावन पावै।
दिव्य अलौकिक भूमि सुहावन, दम्पति को निज धाम कहावे॥ [1]
शिव ब्रह्मादिक रज को तरसै, वेद पुराण विमल जस गावै।
"रूपमाधुरी” बिना कृपा के, एक पलक यहाँ रहि न सकावै॥ [2]
- श्री रूपमाधुरी जी, श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (140)
जिस पर श्री राधा कृपा करतीं हैं केवल उसे ही श्री वृन्दावन का वास प्राप्त होता है। श्री वृन्दावन दिव्य एवं अलौकिक है, यहाँ की भूमि सुहावनी है, जो युगल दम्पति श्री श्यामाश्याम का निज धाम कहलाता है। [1]
श्री वृन्दावन के रज के लिए शिव, ब्रह्मादिक भी तरसते हैं, जिसके विमल यश का गान वेद, पुराण, आदि करते हैं । श्री रूपमाधुरी जी कहते हैं कि "श्री राधा की कृपा के बिना कोई एक क्षण भी श्री धाम वृन्दावन में रह नहीं सकता।" [2]

