(राग गौरी)
नंद-कुल-चंद, वृषभानु-कुल कौमुदी
उदित वृन्दा-विपिन बिमल आकासे। [1]
निकट वेष्टित सखीवृन्द, बरतारिका,
लोचन-चकोर तिन रूप-रस-प्यासे॥ [2]
रसिकजन अनुराग-उदधि तजी मरजाद,
भाव अगनित कुमुदिनी-गन विकासे। [3]
कहि 'गदाधर' सकल विस्व तमघन, बिना
भानु, भव-ताप-अग्यान न बिनासे॥ [4]
- श्री गदाधर भट्ट, श्री गदाधर भट्ट जी की वाणी (30)
श्री वृंदावन रूपी विमल आकाश में नंद कुल के चंद्र (श्री कृष्ण) एवं वृषभानु कुल की पूर्ण चाँदनी (श्री राधा) उदित हुए हैं। [1]
उनके निकट स्थित सखीवृन्द मानो तारागण के समान हैं, जिनके नेत्र चकोर की भांति उनके रूप रस के प्यासे हैं। [2]
रसिकजनों के ह्रदय में अनुराग का सागर मर्यादा को छोड़ उमड़ पड़ा है, जिससे अनगिनत भाव धारण किये कुमुदिनी (कमल) खिल पड़े हैं। [3]
श्री गदाधर भट्ट जी कहते हैं कि "पूरा विश्व अंधकार के मेघ से व्याप्त है एवं बिना सूर्य के उजाला हुए (भगवान की कृपा के), इस भवसागर के तापों एवं अज्ञान का विनाश नहीं होगा।" [4]
नंद-कुल-चंद, वृषभानु-कुल कौमुदी
उदित वृन्दा-विपिन बिमल आकासे। [1]
निकट वेष्टित सखीवृन्द, बरतारिका,
लोचन-चकोर तिन रूप-रस-प्यासे॥ [2]
रसिकजन अनुराग-उदधि तजी मरजाद,
भाव अगनित कुमुदिनी-गन विकासे। [3]
कहि 'गदाधर' सकल विस्व तमघन, बिना
भानु, भव-ताप-अग्यान न बिनासे॥ [4]
- श्री गदाधर भट्ट, श्री गदाधर भट्ट जी की वाणी (30)
श्री वृंदावन रूपी विमल आकाश में नंद कुल के चंद्र (श्री कृष्ण) एवं वृषभानु कुल की पूर्ण चाँदनी (श्री राधा) उदित हुए हैं। [1]
उनके निकट स्थित सखीवृन्द मानो तारागण के समान हैं, जिनके नेत्र चकोर की भांति उनके रूप रस के प्यासे हैं। [2]
रसिकजनों के ह्रदय में अनुराग का सागर मर्यादा को छोड़ उमड़ पड़ा है, जिससे अनगिनत भाव धारण किये कुमुदिनी (कमल) खिल पड़े हैं। [3]
श्री गदाधर भट्ट जी कहते हैं कि "पूरा विश्व अंधकार के मेघ से व्याप्त है एवं बिना सूर्य के उजाला हुए (भगवान की कृपा के), इस भवसागर के तापों एवं अज्ञान का विनाश नहीं होगा।" [4]

