श्री चतुरदासजी की जीवनी

श्री चतुरदासजी की जीवनी

जन्म :
श्री चतुरदासजी का जन्म उत्तर प्रदेश के इटावा जिले में किसी मथुरिया चतुर्वेदी परिवार में भाद्र शुक्ल 6, 1753 को हुआ था।

बाल्यकाल :
व्रज के समीप होने से श्री चतुरदासजी के माता-पिता प्रायः व्रज-वृन्दावन की यात्रा पर आया करते थे। चूंकि स्वामी ललित किशोरीदेवजी के समय से ही माथुर चतुर्वेदी ब्राह्मणों का टटिया संस्थान के प्रति झुकाव चला आ रहा था, अतः पारंपरिक रूप से ये भी उनसे संबद्ध हो गये और यहां की रसरीति के प्रति इनमें आस्था उत्पन्न हो गई। घर का वातावरण भी सरस हो गया। बालक चतुरदास पर भी इसका प्रभाव पड़े बिना न रहा। वे भी कई बार अपने माता-पिता के साथ वृन्दावन आये, श्री बिहारी जी महाराज की बाँकी झांकी के दर्शन किये, टटिया संस्थान के संतों की रहनी सहनी को देखा, अन्य प्रतिष्ठित मंदिर देवालयों, वनस्थलियों और आश्रमों में घूमे, उत्सव-महोत्सव, रास-विलास, वाणी-पाठ और समाज गायन का आनंद लिया और लौट गये अपने माता-पिता के साथ; किन्तु इन यात्राओं का उनके हृदय पर ऐसा प्रभाव पड़ा कि वे युवा होते-होते घर छोड़कर वृन्दावन में रहने लगे।

आध्यात्मिक जीवन :
उन दिनों टटिया स्थान की गद्दी पर स्वामी ललितमोहिनी देव जी विराजमान थे। उनका प्रभाव और सुयश चारों ओर छाया हुआ था, वैराग्य और अनुराग की धाक जमी थी। सिद्ध कोटि के सन्तों में उन्हें सर्वोपरि सम्मान प्राप्त था, निस्पृहता और अपरिग्रह की अनेक घटनाएं जन-जन में चर्चित थीं। सन्त सेवा का प्रमुख केन्द्र बना हुआ था यह स्थान उन दिनों। इस सब ने युवक चतुरदास को बहुत प्रभावित किया; स्वामी श्रीहरिदासजी महाराज की रस-रीति में उन्हें पहले से ही आस्था थी, इसलिए वे स्वामी ललितमोहिनी देव जी के शिष्य हो गये और स्थान में ही रहने लगे।

श्री भगवतरसिक जी से प्रेम :
टटिया स्थान में रहते-रहते श्री चतुरदासजी का परिचय स्वामी श्रीललित मोहिनी देव जी के अग्रगण्य श्रीभगवत रसिक जी से हुआ जो अपनी अनन्य निष्ठा, उत्कृष्ट रहनी, विशूद्ध नित्यविहार की उपासना और उत्कट वैराग्य के कारण लोगों की चर्चा के विषय बने हुए थे। उनका प्रभाव स्वामी चतुरदासजी पर भी पड़े बिना न रहा और वे गुरुदेव की अनुमति लेकर उनके साथ रहने के लिए उस बावड़ी पर चले गये, जो आज भी 'भगवत रसिक जी की बावडी अथवा राधा बावड़ी' के नाम से वृन्दावनस्थ गुरुकुल विश्वविद्यालय की सीमा में, अवस्थित है और टटिया संस्थान के संरक्षण में है। श्री चतुरदास जी के आराध्य ठाकुर श्री चतुर बिहारीजी भी इसी बावड़ी में विराजते हैं । 

आचार्य गद्दी पर विराजमान :
यद्यपि स्वामी चतुरदासजी और श्रीभगवत रसिकजी दोनों ही स्वामी ललितमोहिनी देव जी के शिष्य थे और दोनों ही बड़े भजनानंदी और उत्कृष्ट वैराग्य की मूर्ति थे, पर गुरुदेव से जितनी निकटता का संबंध स्वामी चतुरदास जी का था, उतना श्रीभगवत रसिकजी का नहीं हो पाया। 
कहते हैं कि बाद में तो गुरुदेव स्वामी ललितमोहिनी देव जी श्रीभगवत रसिक जी की किसी त्रुटि पर इतने नाराज हो गये कि उन्हें वृन्दावन का परित्याग करने तक का आदेश दे दिया। श्रीभगवत रसिक जी ने आदेश का पालन किया अवश्य, पर उनकी प्रतिक्रिया अच्छी नहीं रही और उन्होंने अपनी वाणी में यहां तक कह दिया कि 

‘चेला काहू के नहीं, गुरु काहू के नाहिं'
और
'ताते हम परिहरे देहमानी गुरु-चेला।' 
'हम सिष स्यामा स्याम के, गुरु हम स्यामा स्याम' 
- श्री भगवत रसिक जी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रन्थ, उत्तरार्ध (40, 41)

परिणाम यह हुआ कि टटिया संस्थान के तत्कालीन संतों और परवर्ती महानुभावों ने भी श्रीभगवत रसिकजी की बिल्कुल उपेक्षा कर दी तथा उनके नाम तक का उल्लेख किसी ने कहीं भी नहीं किया।

स्वामी चतुरदास जी की स्थिति इस संबंध में अपने गुरुभाई (श्रीभगवत रसिक जी) से भिन्न रही। वे निरन्तर गुरुदेव के सर्वप्रिय, सर्वश्रेष्ठ और विश्वासपात्र शिष्य बने रहे, और उन्हीं की इच्छा से अन्त में उनके निकुञ्ज में प्रविष्ट होने पर 1801 में टटिया संस्थान की गद्दी पर भी विराजमान हुए।

आचार्य गद्दी के लिए मतभेद :
स्वामी सहचरिशरणजी कृत 'ललित प्रकाश' में श्रीहरिदासी सम्प्रदाय के स्वामी ललितमोहिनी देव जी तक के नौ आचार्यों का बड़ा विस्तृत और चमत्कारपूर्ण चरित्र दिया गया है, किन्तु स्वामी ललितमोहिनी देव जी के ही प्रिय शिष्य और उनके तुरन्त बाद गद्दी पर विराजने वाले स्वामी श्रीचतुरदास जी के बारे में मात्र इतनी सूचना दी गई है कि -

श्रीमत चतुरदास सुख साजा। गुरु गद्दी पर आय विराजा।
- स्वामी सहचरिशरण जी, ललित प्रकाश, उत्तरार्द्ध, चौबोला (494)

जिस समय स्वामी चतुरदासजी आचार्य गद्दी पर विराजे, उस समय तीन तरह की मनोवृत्तियों वाले सन्त स्थान में उपस्थित थे - एक तो वे जो स्वामी श्री हरिदासजी महाराज द्वारा प्रकटित नित्य विहार का अनन्यता के साथ निर्वाह करने का संकल्प लिए थे और सब ओर से आँखे मूँद कर अपने उसी प्रशस्त पथ पर निर्द्वन्द्वता और निर्भीकता के साथ मजबूती से कदम बढ़ाते हुए चले जा रहे थे। दूसरे वे जो भीतर से समर्पित तो स्वामीजी की रस-रीति के लिए थे, किन्तु परिस्थितिवश सब के साथ तालमेल रखकर चलना पसन्द करते थे। तीसरे वे व्यक्ति थे, जिन्हें नित्यविहार से कुछ लेना-देना न था और जो केवल बाह्य चमक-दमक तथा ठाट-बाट जुटाने के पक्षधर थे। इनमें प्रथम श्रेणी के व्यक्तियों को आचार्य-गद्दी से कोई आकर्षण न था, क्योंकि वे परमोत्कृष्ट नित्यविहार सुख में निमग्न रहकर इस नित्यविहार की ओर आँख उठाकर भी नहीं देखना चाहते थे। 
दूसरी श्रेणी के व्यक्ति गद्दी से लगाव न होने पर भी इसलिए उसपर आरूढ़ होना चाहते थे कि स्वामी ललितकिशोरी देव जी द्वारा परिष्कृत उज्ज्वल रस-धारा में कहीं बहिर्मुखी पुनः मिलौनी न करदें।
तीसरी श्रेणी के व्यक्ति गद्दी पर आसीन होना तो नहीं चाहते थे क्योंकि उनमें स्वामी श्रीहरिदासजी महाराज द्वारा प्रवर्तित इस पद्धति के आचार का अभिनय करने की भी सामर्थ्य न थी, किन्तु उनका यह प्रयास पूरे जोर से चल रहा था कि कोई ऐसा व्यक्ति गद्दीनशीन हो, जो हमारे हाथ की कठपुतली बन कर रहे और हम उसे जिस प्रकार नचायें, नाचता रहे। सारांश यह है कि गद्दी पर किसी दूसरी श्रेणी के व्यक्ति को ही बैठना था। इस श्रेणी के सर्वाधिक तेजस्वी व्यक्ति स्वामी चतुरदासजी ही थे, जो बिना किसी बात का आगा-पीछा सोचे बिना किसी बहिर्मुखी की परवाह किये, नित्यविहार रस के अनन्य प्रहरी के रूप में, गुरु-गद्दी पर आकर विराज गये।

बहिर्मुख संतों द्वारा कलह एवं टटिया स्थान का त्याग करना :
गद्दी पर आसीन होने के बाद स्वामी चतुरदासजी ने अपने गुरुदेव स्वामी श्रीललितमोहिनी देव जी को ही अपना आदर्श माना, सन्त सेवा भी खूब की, सभी सम्प्रदाय के साधुओं का सम्मान भी बिना किसी भेद-भाव के किया, हरि-भक्तिपरायण गृहस्थों से भी जुड़े रहे और सेठ साहूकार तथा राजे-महाराजे भी इनका विपुल आर्थिक सहयोग करते हुए स्वयं को गौरवान्वित और धन्य मानते रहे, किन्तु इनका अभ्यन्तर श्रीस्वामी हरिदासजी महाराज द्वारा प्रवर्तित विशुद्ध रसमयी नित्यविहार उपासना की परम अपरिग्रही सरणी से पलभर को भी पृथक् न हो पाया। संसार के समस्त व्यवहारों का निर्वाह करते हुए भी इन्होंने सिद्धान्त यही स्थिर किया कि -

श्री स्वामी हरिदास भज, छाँड़ि सकल जंजार।
या चक्कर में मति परै, यह झूठौ संसार॥
- स्वामी चतुरदासजी की साखी (10)

उन्होंने तर्क-कुतर्क के झमेले में न पड़कर सिर्फ इतना ही कहा-

चतुरदास हरिदास कौ अद्भुत नित्यविहार।
यहां औरन की कहा चलै, वेद न पावै पार॥
- स्वामी चतुरदासजी की वाणी, साखी (12)

कुछ बहिर्मुख संतों ने अनावश्यक यह मुद्दा ढूंढा कि चतुरदासजी भगवत रसिक के साथी हैं, स्वामी ललितमोहिनी देवजी के उन पर नाराज हो जाने पर भी इन्होने उनका साथ नहीं छोड़ा, इसलिए ये भी गुरुजी के अपराधी हैं। गुरु के अपराधी को उनकी गद्दी पर बने रहने का कोई अधिकार नहीं।
बहिर्मुखों ने इस मुद्दे को खूब रंग दे देकर उछाला जिसका परिणाम यह हुआ, कि अधिकांश व्यक्ति इसके जाल में उलझ गये। यहाँ तक कि आश्रम के कोठारी, पुजारी, रसोइया-भण्डारी तक इस दुरभिसंधि के शिकार हो गये। यद्यपि इन्होंने खुलकर कभी कुछ नहीं कहा, किन्तु इनके व्यवहार में बदलाव आने लगा था।
स्वामी चतुरदासजी से यह बात अधिक दिनों तक छिपी न रह सकी। उन्होंने लोगों को बहुत समझाया कि मैं गुरुदेव के आदेश से ही गद्दी पर बैठा हूँ। मुझे व्यक्तिगत रूप से इससे कोई लगाव नहीं है। मैं चाहता हूँ कि स्वामीजी के रस-जस की स्वरूपगत पहिचान बनी रहे, क्योंकि उन्होंने मुझे ऐसा निर्देश ही दिया था। जब तक उनकी इच्छा है, मैं इस काम में लगा हूँ, इस पर भी जिस दिन गुरुजी का आदेश होगा, मैं तत्काल गद्दी छोड़ दूँगा, क्योंकि मैं स्वामीजी के नित्यविहार के स्वरूप को जानता हूँ। कोई भी सम्प्रदाय या मत इसे पचा नहीं सकता। यह रस-स्वरूप प्रिया-प्रियतम के हृदय स्थल में विहार करने वाला वह अमृत स्रोत है, जिसे लाख-लाख रेगिस्तानों की प्यास भी सुखा न पायेगी।
बहिर्मुखों ने इसका कुछ और ही अर्थ लगाया। उनके कथन की नई-नई व्याख्याएँ होने लगीं। अन्य सम्प्रदायी महानुभावों को भड़काया जाने लगा, विरोध का स्वर और ऊँचा हुआ, और व्यापक हुआ, कुछ और लोग इससे आ जुड़े। वातावरण विषाक्त हो गया।
उस समय स्थान में कोई ऐसा प्रभावशाली सन्त न था, जो इस गृह-कलह को शान्त कर सकता। श्री भगवतरसिक जी पहले ही वृन्दावन छोड़ कर चले गये थे। स्वामीजी की रसरीति को समझने वाले अन्य रसिक इस दुरवस्था की ओर आँख उठाकर देखना भी नहीं चाहते थे। शेष व्यक्ति चाहे-अनचाहे विरोधियों के खेमे में पहुंच चुके थे। ऐसी स्थिति में स्वामी चतुरदासजी जैसे नित्यविहार-रस रसिक परम विरक्त आचार्य इस बोझ को अपने सिर पर कब तक उठाये रहते। उन्होंने श्रीहरि-गुरु की इच्छा समझ कर 1802 में टटिया स्थान को छोड़ दिया और पूर्व दिशा में श्रीयमुनाजी के तट की ओर बढ़ गये। वहा एक ऊंचा टीला था, जिसे चारों ओर से सुरम्य वनश्री ने घर रखा था। इस एकान्त स्थान को भजन-साधन के लिए उपयुक्त देखकर वे वहीं रहने लगे और अन्त समय तक वहीं श्रीप्रियालाल की रसमयी लीलाओं का गान करते रहे।
उस टीले पर बहुत समय तक स्वामी श्रीचतुरदासजी की समाधि के दर्शन होते रहे, किन्तु कुछ पहले श्रीयमुनाजी ने उसे भी अपनी गोद में समेट लिया।
हरिदासी संप्रदाय के टटिया संस्थान की गद्दी पर विराजमान वर्तमान आचार्य स्वामी श्रीराधाचरणदास जी महाराज की छाप से स्वामी श्रीचतुरदासजी से संबंधित तीन बधाई के पद भी मिले हैं -

प्रगटी स्वामिनि चतुर सहेली।
श्रीवृंदावन नित्यबिहारौ, कुंज कुंज द्रुमबेली॥
सखी सहचरी सुख बरसावत, प्रिया स्याम करत हैं केली।
श्रीराधाचरन निरखि बलि जावैं, कहि कहि प्रेम सहेली॥

“श्री वृन्दावन में चतुर (चतुरदास जी) सहेली का प्राकट्य हुआ है, सखियाँ सुख की वर्षा कर रही है, श्री श्यामाश्याम विहार परायण हैं। इस दृश्य का अवलोकन कर श्री राधाचरण स्वयं को न्यौछावर करते हैं।“

बाजत बधाई आँगन माहिं।
प्रकटे चतुरदास सुखदाई, आनंद उर न समाहिं॥
श्रीहरिदास कृपा के सागर विपुल विनोद बढ़ाहिं।
श्रीराधाचरन तोरि तृन छवि पर, मंद-मंद मुसिक्याहिं॥

“श्री वृन्दावन में बधाई के गीत बज रहे हैं क्योंकि श्री चतुरदास जी प्रकट हुए हैं, हर कोई आनंद से भर गया है।”

भादों सुकल छठु सुखदाई।
चतुरदास रस रासि प्रकट भये सोभा सहज सुहाई॥
मोर-चकोर सोर, पिक गावैं, कुंजनि बजत बधाई।
श्रीराधाचरन देखि के हरषैं, रंक महानिधि पाई॥

“भादो के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि अत्यंत सुखद है, रस के सागर के समान श्री चतुरदास जी प्रकट हुए हैं।”

शिष्य परंपरा :
श्रीस्वामी चतुरदासजी के विरक्त शिष्यों में निम्नलिखित सात शिष्यों के नाम उल्लेखनीय हैं -
1. श्रीवृन्दावनदासजी, 2. श्रीगिरधारीदासजी, 3. श्रीगोविंददासजी, 4. श्रीदयालदासजी, 5. श्रीविपुलदासजी, 6. श्रीलाड़िलीदासजी और 7. भीमासखीजी।
इनमें भीमासखीजी की परंपरा अद्याविधि विद्यमान है, जो इसप्रकार है - श्री भीमासखीजी - श्रीचरनदासजी - श्रीगिरिवरदास जी - श्रीकृष्णदासजी - श्रीचंचलदासजी - श्रीकान्हरदासजी - श्रीराधिकादासजी।

रचना :
श्रीचतुरदासजी की वाणी मात्रा में कितनी थी, इसका कहीं कोई उल्लेख नहीं मिलता। संप्रति श्रीबाबा अलबेलीदासजी एवं पुजारी श्री दीनबंधुदास जी के सहयोग से मात्र 13 साखियाँ और रस-संबंधी 4 पद उपलब्ध हुए हैं। 
श्रीस्वामी चतुरदासजी की वाणी यद्यपि मात्रा में अत्यल्प है, पर जो है उससे इनकी स्वामी श्रीहरिदासजी महाराज के प्रति अनन्य निष्ठा परिलक्षित होती है। पूर्वाचार्यों की भाँति इनका भी विश्वास है कि केवल श्रीस्वामीजी महाराज की कृपा से ही नित्यविहार रस की उपलब्धि हो सकती है और इसकी उपलब्धि ही जीवन का चरम लक्ष्य है। नित्यविहार का सुख ही सर्वोपरि सुख है। इस नित्यविहार का एकमात्र अधिष्ठान श्रीधाम वृंदावन है और श्रीवृंदावन का वास निकुंजविहारिणी श्रीकिशोरीजी की कृपा पर निर्भर है।

वृन्दावन से प्रेम :

चतुरदास चित चौंप सों, करि वृन्दावन वास।
काम केलि निरखत रहै, और कछू नहिं आस॥
- स्वामी श्री चतुरदास जी, साखी (1)

श्री चतुरदासजी कहते हैं कि हृदय के पूरे उमंग और उल्लास के साथ वृन्दावन में निवास करो, 
वृन्दावनविहारी-विहारिणी श्रीप्रियालाल की प्रेमकेलि-नित्यविहार का अवलोकन किया करो।
विशुद्ध नित्यविहार के अतिरिक्त तुम्हारे अन्दर और कोई आकांक्षा ही नहीं होनी चाहिए।

सो सुख वृन्दाविपिन है, मूल आदिद्रुम जैस।
ललितादिक निरखैं चतुर, जुगल नवल सम वैस॥
- स्वामी श्री चतुरदास जी, साखी (6)

नित्य सुख का मूल श्रीधाम वृन्दावन है। संसार रूपी आदिवृक्ष में जो सुख-लेश की प्रतीति हो रही है, उस सुख का मूल स्रोत भी श्रीधाम वृन्दावन ही है। वह वृन्दावन का सुख जैसा है, श्रीचतुरदासजी कहते हैं, कि उसे ललितादिक सहचरियाँ नित नव कैशोर-मण्डित श्रीश्यामाकुंजविहारी के रूप में देखती हैं।

श्रीवृन्दावन सहज समाज।
नित्य अखंड विसद भूतल पर, राज मनिमय सुनि सखी गाज॥
आस पास जमुना रस छाई, छिन छिन करति जुगल के काज।
ललितादिक मिलि तान तरंगनि, बाजत विविध भाँतियन बाज॥
विविध भाँति फूली द्रृम बेली, मनहू प्रिया प्रिय सहज विराज।
बरसत सुमन परम सुखदायक, चलत परस्पर रंगनि राज॥
सारस मोर चकोर कोकिला, बोलत विहंग करत आवाज।
नेति नेति श्रुति सुमृति गावत; रहें जु सबनि कौ है सिरताज॥
रसनिधि गुननिधि आनन्द को निधि, उपमा को है नहिं आज।
विहरत जहँ नव नगरी निसिदिन, निरखत चतुर करत दोऊ राज॥
- स्वामी श्री चतुरदास जी, रस के पद (6)

अरी सखी, श्रीधाम वृन्दावन की स्वाभाविक शोभा-सम्पत्ति भी बड़ी मनोहारी है। यह नित्य है, इसका त्रिकाल में कभी विनाश नहीं होता। यह समस्त मायिक दोषों से रहित है और इसी भूतल पर सुशोभित हो रहा है। मणि-माणिक्यों से रचित-खचित यहाँ की भूमि बड़ी सुन्दर है। इसके आस-पास कुण्डलाकार श्रीयमुनाजी सुशोभित हो रही हैं जो प्रतिपल युगलकिशोर श्रीश्यामाश्याम का मनभाया कार्य किया करती हैं। ललितादिक सखियाँ मिलकर नाना भाँति गा रही हैं और विविध प्रकार के वाद्य-यंत्र बजा रही हैं। द्रुम-वल्लरियाँ उमंग में भर बिविध प्रकार के फूलों से गदरा गई हैं, ऐसा प्रतीत होता है मानों साक्षात् प्रिया-प्रियतम ही उन रूपों में विराज रहे हों। परस्सर हिल-डुल कर ये परम आनन्द को प्रदान करने वाले सुमनों को वृष्टि कर रहे हैं। सारस, मयूर, चकोर, कोयल आदि बोल रहे हैं। छोटे-छोटे गगनबिहारी पक्षी अपनी मधुर-मधुर ध्वनि से वातावरण को और अधिक स्निग्ध बनाये हुए हैं। श्रुति-स्मृतियाँ इसके स्वरूप-गुण का निर्वचन करने में अपने को असमर्थ पाकर 'नेति नेति' कह विराम ले रही हैं। यह समस्त धामों का मुकुटमणि है। यह रस की खान है, गुणों का खजाना है और आनन्द का सागर है।
अद्यावधि कोई ऐसा नहीं, जिससे इसकी उपमा दी जा सके। यहाँ अहर्निश निरन्तर नित नवकिशोर श्री श्यामाकुंजविहारी विहार-विलास करते रहते हैं। यहाँ इन्हीं नित्यविहारी युगल का राज है। चतुर सहचरी सदा इन्हीं को निरखती रहती है।