सुने री मैंने निरबल के बल राम - श्री सूरदास, सूरसागर

सुने री मैंने निरबल के बल राम - श्री सूरदास, सूरसागर

(राग भैरवी तीन ताल)
सुने री मैंने निरबल के बल राम।
पिछली साख भरूँ सन्तन की, अड़े सँवारे काम॥ [1]
जब लगि गज बल अपनो बरत्यो, नेक सरो नहिं काम।
निरबल ह्वै बलराम पुकार्यो, आये आधे नाम॥ [2]
द्रुपद सुता निरबल भई ता दिन, तजि आये निज धाम।
दुस्सासन की भुजा थकित भई, बसन रूप भये श्याम॥ [3]
अपबल तपबल और बाहुबल, चौथो है बल दाम।
सूर किसोर कृपा ते सब बल, हारे को हरिनाम॥ [4]

- श्री सूरदास, सूरसागर

मैंने सुना है कि निर्बल के बल भगवान हैं। प्राचीन संत भी साक्षी हैं कि जो अपने आपको भगवान के भरोसे छोड़ देते हैं, उनके सभी बिगड़े काम प्रभु स्वयं संवार देते हैं। [1]

जब तक गजराज मगरमच्छ से अपने बल से लड़ता रहा तब तक भगवान नहीं आये । अंत में निर्बल होकर जब उसने भगवान को आरत भाव से पुकारा तो उसके द्वारा आधा नाम उच्चारण करते ही हरि दौड़ कर पहुँच गये। [2]

इसी प्रकार कौरवों की सभा में द्रौपदी के चीर हरण के समय जब द्रौपदी ने अपनी लाज बचाने के लिए निर्बल होकर श्री कृष्ण को पुकारा तो वे साड़ी के रूप में प्रकट हो गये। दु:शासन साड़ी खींचते-खींचते थक गया, किंतु द्रौपदी की साड़ी श्याम रूप धारण कर बढ़ती ही गयी। [3]

सूरदासजी कहते हैं कि लोगों को प्रायः आत्म बल, अपनी तपस्या का बल, शारीरिक बल तथा अपने धन का बल (अभिमान) रहता है। परंतु जब मनुष्य समस्त बलों का त्याग कर, केवल भगवान के भरोसे हो कर, उनके नाम का बल लेकर उन्हें आरत भाव से पुकारता है तभी उसका वास्तविक कल्याण होता है। [4]