बन्दौं राधिका पद पद्म - श्री अग्रदास जी (श्री नाभा जी के गुरु)

बन्दौं राधिका पद पद्म - श्री अग्रदास जी (श्री नाभा जी के गुरु)

बन्दौं राधिका पद पद्म।
परम कोमल सुभग शीतल, कृपा जुत सुख कद्म॥ [1]
चरन चिंतत अमल उर छ्वै, जात सबही छद्म।
भाल पर अक्षर अनैसे, होत परसत रद्म॥ [2]
कृष्ण अलंकृत सुहथ पूजत, निगम नूपुर नद्म।
रसिकजन जीवन सू मूली, 'अग्र' सर्व सु सद्म॥ [3]

- श्री अग्रदास जी (श्री नाभा जी के गुरु)

भूमिका: श्री अग्रदास जी ने अपने शिष्य श्री नाभादास जी की सेवा से प्रसन्न हो उन्हें भक्त चरित्र रचना करने की आज्ञा देकर वरदान दिया कि जिस भक्त का तुम चिंतन करोगे वह तुम्हारे ध्यान में प्रकट होकर तुम्हें अपना चरित्र बतला देंगे। इस आज्ञा से श्री नाभादास जी ने भक्तमाल ग्रन्थ की रचना का आरम्भ किया। सबका चरित्र तो उन्होंने लिख दिया परंतु जब उन्होंने वृन्दावन के परम रसिक महानुभावों (महाप्रभु हित हरिवंश जी,स्वामी श्री हरिदास जी आदि) का ध्यान किया तो ये रसिकजन ध्यान में नहीं आए । तब नाभादास जी ने इस वृतांत को गुरुदेव श्री अग्रदास जी को सुनाया, तो श्री अग्रदास जी ने कहा "तुमने भक्तमाल ग्रन्थ के मंगलाचरण में श्री हरि के 24 अवतारों का वर्णन किया, जिससे उनके भक्तों का तुम्हें ध्यान में दर्शन हुआ, परन्तु वृन्दावन के रसिकजन तो श्री राधारानी के अनन्य भक्त हैं, इसीलिए रसिकजन तुम्हारे ध्यान में नहीं आये। तुम श्री राधारानी से प्रार्थना करो एवं उनके श्री चरणों की भक्ति करो, यदि उनकी कृपा हो गई तो ही वे परम अंतरंग भक्त तुम्हारे ध्यान में आएँगें” । ऐसा कहकर श्री अग्रदास जी ने नाभादास जी को एक पद प्रदान किया, जिसका भाव इस प्रकार है -

भावार्थ: हे श्री राधा, मैं आपके चरण कमलों की वंदना करता हूँ, जो परम सुकोमल हैं, सुन्दर एवं शीतल हैं, कृपा युक्त हैं एवं सुख के धाम हैं। [1]

इन चरण कमलों का चिंतन करने से ह्रदय निर्मल हो जाता है एवं अन्यत्र सब कुछ मिथ्या लगने लगता है। इन श्री चरणों के स्पर्श (चिंतन) से भाग्य की अनिष्ट रेखाओं का अनायास ही निवारण हो जाता है एवं रस प्राप्त हो जाता है। [2]

इन चरण कमलों को श्री कृष्ण अपने हस्त-कमलों से अलंकृत कर उसका पूजन करते हैं जिनकी नूपुर की ध्वनि से निगम (वेद, उपनिषद, आदि) प्रकट होते हैं। श्री अग्रदास जी कहते हैं कि रसिक जनों के जीवन का आधार, श्री राधा रानी के चरणारविंद ही मेरा अनन्य आश्रय हैं। [3]