मेरी कुंजबिहारिन रानी - श्री रूप सखी जी की वाणी, श्रृंगार रस के पद (578)

मेरी कुंजबिहारिन रानी - श्री रूप सखी जी की वाणी, श्रृंगार रस के पद (578)

(राग विहागरौ)
मेरी कुंजबिहारिन रानी।
कुंजबिहारी हरषि लडावत, अंग - अंग छबि बानी॥ [1]
आनंद कोक कला गुन गूढनि, छोरि ग्रंथ रस सानी।
रसिक रूप नित्य कुंजबहारिन, लालहि अति सुखदानी॥ [2]

- श्री रूप सखी, श्री रूप सखी जी की वाणी, श्रृंगार रस के पद (578)

मेरी स्वामिनी कुँजबिहारिनी श्री राधारानी हैं, जिन्हें कुंजबिहारी श्री कृष्ण बड़े हर्ष से लाड़ लड़ाते हैं, जिनके अंग-अंग की छवि की कांति वाणी से परे है। [1]

कोक कला में परम प्रवीण श्री राधिका आनंद प्रदान करने वाली हैं, जो समस्त सारों का भी सार हैं एवं सदा रस में निमग्न रहने वाली हैं। श्री रूप सखी जी कहते हैं कि कुँजबिहारिनी श्री राधा नित्य ही लाल जी (श्री कृष्ण) को सुख प्रदान करती हैं। [2]