(छप्पय)
तैं भाजन कृत जटित विमल चंदन कृत इन्धन ।
अमृत पूरि तिहे मध्य करत सरषप - खल रिंधन ॥ [1]
अद्भुत धर पर करत कष्ट कंचन हल वाहत ।
बार करत पाँवार मंद बोबन विष चाहत ॥ [2]
(जैश्री) हित हरिवंश विचारि कै मनुज देह गुरु-चरण गहि ।
सकहि तौ सब परपंच तजि कृष्ण-कृष्ण-गोविन्द कहि ॥ [3]
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री स्फुट वाणी (7)
जैसे कोई विविध रत्नों से जटित स्वर्णपात्र में अमृत भरकर उसे चूल्हे पर चढ़ाकर चन्दन की लकड़ी से अग्नि प्रज्बलित करके उसमें सरसों की खली को रांधे, अर्थात इस दुर्लभ मनुष्य देह से असत्य विषय सुख प्राप्त करना चाहे, तो वह पुरुष मन्दमति नहीं तो क्या कहा जाएगा ? [1]
यदि अद्भुत भूमि में कष्ट करके, कंचन के हल से उसे जोतकर, उसमें मूँगे की बाड़ लगाकर, उसमें तुम विष बोना चाहते हो तो वो मूढ़ता नहीं तो क्या है । [2]
श्री हित हरिवंश कहते हैं कि इसलिए इस मानवदेह का दुरुपयोग मत करो, गुरु-चरणों का आश्रय लेकर, समस्त प्रपंचों का त्याग कर, श्री कृष्ण का भजन करो । [3]
तैं भाजन कृत जटित विमल चंदन कृत इन्धन ।
अमृत पूरि तिहे मध्य करत सरषप - खल रिंधन ॥ [1]
अद्भुत धर पर करत कष्ट कंचन हल वाहत ।
बार करत पाँवार मंद बोबन विष चाहत ॥ [2]
(जैश्री) हित हरिवंश विचारि कै मनुज देह गुरु-चरण गहि ।
सकहि तौ सब परपंच तजि कृष्ण-कृष्ण-गोविन्द कहि ॥ [3]
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री स्फुट वाणी (7)
जैसे कोई विविध रत्नों से जटित स्वर्णपात्र में अमृत भरकर उसे चूल्हे पर चढ़ाकर चन्दन की लकड़ी से अग्नि प्रज्बलित करके उसमें सरसों की खली को रांधे, अर्थात इस दुर्लभ मनुष्य देह से असत्य विषय सुख प्राप्त करना चाहे, तो वह पुरुष मन्दमति नहीं तो क्या कहा जाएगा ? [1]
यदि अद्भुत भूमि में कष्ट करके, कंचन के हल से उसे जोतकर, उसमें मूँगे की बाड़ लगाकर, उसमें तुम विष बोना चाहते हो तो वो मूढ़ता नहीं तो क्या है । [2]
श्री हित हरिवंश कहते हैं कि इसलिए इस मानवदेह का दुरुपयोग मत करो, गुरु-चरणों का आश्रय लेकर, समस्त प्रपंचों का त्याग कर, श्री कृष्ण का भजन करो । [3]

