राधा नामास्ति जिह्वाग्रे, किं सुसाधनकोटिभिः।
राधा-रस-सुधा-स्वादो, यदि किं साध्यकोटिभिः॥
- श्री वागीश शास्त्री जी, श्रीराधासप्तशती (7.91)
जिसकी जिह्वा पर श्रीराधा-नाम आ गया, उसे किसी भी सुन्दर से सुन्दर साधन की आवश्यकता नहीं रहती; और यदि किसी को श्रीराधा-रस-सुधा का आस्वादन मिल गया तो उसके लिये दूसरे कोटि-कोटि साध्यों की भी क्या आवश्यकता है अर्थात् उसके लिए वे सब उत्तमोत्तम साध्य निरर्थक हो जाते हैं।
राधा-रस-सुधा-स्वादो, यदि किं साध्यकोटिभिः॥
- श्री वागीश शास्त्री जी, श्रीराधासप्तशती (7.91)
जिसकी जिह्वा पर श्रीराधा-नाम आ गया, उसे किसी भी सुन्दर से सुन्दर साधन की आवश्यकता नहीं रहती; और यदि किसी को श्रीराधा-रस-सुधा का आस्वादन मिल गया तो उसके लिये दूसरे कोटि-कोटि साध्यों की भी क्या आवश्यकता है अर्थात् उसके लिए वे सब उत्तमोत्तम साध्य निरर्थक हो जाते हैं।

