स्वामिनी जू भामिनी जू हंस कल गामिनी जू - श्री लाल बलबीर जी, ब्रज बिनोद, श्री राधा शतक (41)

स्वामिनी जू भामिनी जू हंस कल गामिनी जू - श्री लाल बलबीर जी, ब्रज बिनोद, श्री राधा शतक (41)

(कवित्त)
स्वामिनी जू भामिनी जू हंस कल गामिनी जू,
कोटि द्युति दामिनी जू पीउ चितचोरी जू। [1]
लाल संग रमनी जू केलि रस कमनी जू,
छबि कंज बदनी जू सर्व तन गोरी जू॥ [2]
सखी सभा मंडनी रसिक लाल बंदनी,
अनन्द रस कन्दनी चतुरी और भोरी जू। [3]
'लाल बलबीर' दासी तोरी सरन सुखरासी,
रखिये सदैव पासी कीरति किसोरी जू॥ [4]

- श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री राधा शतक (41)

मेरी स्वामिनी श्री राधा जू भामिनि हैं जिनकी गति हंस के समान है, जिनके बदन की कांति कोटि कोटि दामिनी की द्युति के समान है जो प्रियतम श्री कृष्ण के चित्त को चुराने वाली हैं। [1]

वे सदा श्री कृष्ण के संग रमण करती हैं, केलि रस का वर्षण करती हैं, जिनकी छवि कमल के समान मनोहर है जिनका सर्वांग गौर वर्ण का है। [2]

वे सखी-सभा से सदा मंडित रहती हैं, रसिक प्रियतम श्री कृष्ण द्वारा वंदनीय हैं, आनंद-रस की मूल स्रोत हैं तथा समस्त कलाओं में निपुण होते हुए भी परम भोली हैं। [3]

श्री लाल बलबीर कहते हैं कि "हे सुख की राशी श्री किशोरी जू, मैं आपकी दासी सदा आपके शरण में हूँ, कृपा मुझे सदैव अपने पास ही रखिये।" [4]