प्रेम प्रेम ही उपजै - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (88)

प्रेम प्रेम ही उपजै - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (88)

प्रेम प्रेम ही उपजै, जो करै प्रेम की वारि।
तब हि प्रेम फूलै फरै, यौं प्रेमिन कह्यौ पुकारि॥

- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (88)

जब जीव का संग बाड़ स्वरूप (सीमा रूप से) एक मात्र प्रेमी जनों से हो जाता है तभी ह्रदय में प्रेम का अंकुर उदय होकर फूलता फलता है, इसी बात को सभी प्रेमीजनों ने पुकार पुकार कर कही है।