ढूँढ़ि फिरै त्रैलोक जो, बसत कहूँ 'ध्रुव' नाहिं।
प्रेम रूप दोउ एक रस, बसत निकुंजनि माहिं॥
- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, प्रेमावली (53)
कोई त्रिलोकी में ढूँढ़ता फिरे तो भी उसे ऐसे सहज प्रेमी कहीं देखने को भी नहीं मिलेंगे जैसे साक्षात् प्रेम स्वरूप श्री राधा कृष्ण सदा एकरस वृन्दावन की निभृत-निकुञ्जों में निवास करते हैं।
प्रेम रूप दोउ एक रस, बसत निकुंजनि माहिं॥
- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, प्रेमावली (53)
कोई त्रिलोकी में ढूँढ़ता फिरे तो भी उसे ऐसे सहज प्रेमी कहीं देखने को भी नहीं मिलेंगे जैसे साक्षात् प्रेम स्वरूप श्री राधा कृष्ण सदा एकरस वृन्दावन की निभृत-निकुञ्जों में निवास करते हैं।

