कृष्ण कृपालु कृपाकण गेरो - श्री ललित विहारिणी जी

कृष्ण कृपालु कृपाकण गेरो - श्री ललित विहारिणी जी

कृष्ण कृपालु कृपाकण गेरो।
मन मूरख नित भटक रह्यौ है, झूंठे सुख हित पलछिन केरो॥ [1]
अविरल भक्ति प्रीति दृढ़ चरणन, चाहत श्रीवन कुंज बसेरो।
'ललितविहारिणि' चित्त अति चंचल, करि राखो नित चरणन चेरो॥ [2]

- श्री ललित विहारिणी जी

हे कृपालु श्री कृष्ण, अपनी अकारण कृपा के कुछ कणों की मुझ पर भी वर्षा कीजिये! मेरा मन मुर्ख सदा मिथ्या सुख की चाह में ही नित्य भटकता रहता है। [1]

मुझे अपनी अविरल भक्ति एवं चरण कमलों की दृढ प्रीती प्रदान कीजिए । मुझे श्री वृन्दावन के कुञ्ज का वास प्रदान कर मेरी अभिलाषा को पूर्ण करिए । श्री ललितविहारिणी जी कहते हैं कि "हे श्री कृष्ण, मेरा चित्त अति चंचल है, मुझे दासी समझकर अपने श्री चरणों में ही रखिये।" [2]