(राग रामकली-ताल तिताला)
माई मोकों जुगलनाम निधि भाई।
सुख-संपदा जगतकी झूठी, आई संग न जाई॥ [1]
लोभीको धन काम न आवै, अंतकाल दुखदायी।
जो जोरै धन अधम करम तें, सर्बस चलै नसाई॥ [2]
कुलके धरम कहा लै कीजै, भक्ति न मनमें आई।
जुगलप्रिया सब तजौ भजौ हरि, चरन कमल मन लाई॥ [3]
- श्री जुगलप्रिया जी
हे सखी, मुझे तो परम धन युगल नाम (राधाकृष्ण) ही अच्छा लगता है। संसार की समस्त सुख-संपत्ति झूठी है, यह न हमारे संग जन्म से आयी है न मृत्यु के बाद संग जाएगी। [1]
लोभी व्यक्ति को उसका धन काम नहीं आता है, अंत समय में उसे दुःख भोगना पड़ता है एवं उसकी दुर्गति होती है। जो अधर्म से युक्त होकर धन संचय करता है उसका सर्वस्व नाश हो जाता है। [2]
कुल के धर्म कहाँ तक निभाओगे, उससे मन में भक्ति नहीं आएगी। श्री जुगलप्रिया जी कहते हैं कि "सब त्याग दो एवं श्री हरि के चरण कमलों को अपने मन में बसाकर उसका नित्य भजन करो।" [3]
माई मोकों जुगलनाम निधि भाई।
सुख-संपदा जगतकी झूठी, आई संग न जाई॥ [1]
लोभीको धन काम न आवै, अंतकाल दुखदायी।
जो जोरै धन अधम करम तें, सर्बस चलै नसाई॥ [2]
कुलके धरम कहा लै कीजै, भक्ति न मनमें आई।
जुगलप्रिया सब तजौ भजौ हरि, चरन कमल मन लाई॥ [3]
- श्री जुगलप्रिया जी
हे सखी, मुझे तो परम धन युगल नाम (राधाकृष्ण) ही अच्छा लगता है। संसार की समस्त सुख-संपत्ति झूठी है, यह न हमारे संग जन्म से आयी है न मृत्यु के बाद संग जाएगी। [1]
लोभी व्यक्ति को उसका धन काम नहीं आता है, अंत समय में उसे दुःख भोगना पड़ता है एवं उसकी दुर्गति होती है। जो अधर्म से युक्त होकर धन संचय करता है उसका सर्वस्व नाश हो जाता है। [2]
कुल के धर्म कहाँ तक निभाओगे, उससे मन में भक्ति नहीं आएगी। श्री जुगलप्रिया जी कहते हैं कि "सब त्याग दो एवं श्री हरि के चरण कमलों को अपने मन में बसाकर उसका नित्य भजन करो।" [3]

