माँछी, माँछ माँगने, मूँसे बाँदर चोर ।
काँटे, दीमक, जीविका, जागा दस दुख घोर ॥ [1]
जागा दस दुख घोर, बास क्यों कीजै बन में ।
असन बसन बिनु मिले, रहै ना धीरज मन में ॥ [2]
भगवतरसिक अनन्य मिलन दुस्तर स्त्रुति साछी ।
बिहरत स्यामा स्याम, जहँ नहिं माँछर माँछी ॥ [3]
- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, निर्विरोध मनरंजन (20)
साधारण साधक को वृन्दावन वास करने में मक्खी, मच्छर, भिखारी, चूहे, बंदर, चोर, काँटे, दीमक, जीविका और रहने के लिए स्थान की समस्या - ये दस घोर दुःख सताते हैं। [1]
इन दस घोर दुःखों के रहते श्रीवृन्दावन वास कैसे किया जाय? इस पर भी भोजन और कपड़ों के न मिलने पर तो उसके मन का धैर्य ही टूट जाता है। [2]
भगवत रसिक जी कहते है कि इन सब कष्टों को सहकर भी यदि वृन्दावन वास किया जाय तो अनन्य रसिकों का मिलना तो बहुत ही कठिन है। श्रुतियाँ साक्षी है कि अनन्य रसिकों की कृपा से ही उस दिव्य वृन्दावन में पहुँचा जा सकता है, जहाँ श्यामा श्याम नित्यविहार करते रहते हैं और जहाँ मक्खी, मच्छर, आदि का कोई कष्ट नहीं है। [3]
काँटे, दीमक, जीविका, जागा दस दुख घोर ॥ [1]
जागा दस दुख घोर, बास क्यों कीजै बन में ।
असन बसन बिनु मिले, रहै ना धीरज मन में ॥ [2]
भगवतरसिक अनन्य मिलन दुस्तर स्त्रुति साछी ।
बिहरत स्यामा स्याम, जहँ नहिं माँछर माँछी ॥ [3]
- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, निर्विरोध मनरंजन (20)
साधारण साधक को वृन्दावन वास करने में मक्खी, मच्छर, भिखारी, चूहे, बंदर, चोर, काँटे, दीमक, जीविका और रहने के लिए स्थान की समस्या - ये दस घोर दुःख सताते हैं। [1]
इन दस घोर दुःखों के रहते श्रीवृन्दावन वास कैसे किया जाय? इस पर भी भोजन और कपड़ों के न मिलने पर तो उसके मन का धैर्य ही टूट जाता है। [2]
भगवत रसिक जी कहते है कि इन सब कष्टों को सहकर भी यदि वृन्दावन वास किया जाय तो अनन्य रसिकों का मिलना तो बहुत ही कठिन है। श्रुतियाँ साक्षी है कि अनन्य रसिकों की कृपा से ही उस दिव्य वृन्दावन में पहुँचा जा सकता है, जहाँ श्यामा श्याम नित्यविहार करते रहते हैं और जहाँ मक्खी, मच्छर, आदि का कोई कष्ट नहीं है। [3]

