कर लै दरपन स्यांम दिखावत,
स्यांमा जू संवारत सीस के मोती। [1]
इकटक रहे निरखि सुंदर वर,
सुधासदन ससिवदनी की जोती॥ [2]
रूपरसिक रस-चसक चसे चखि,
लखि लखि सखी सोभा अनहोती। [3]
कहत न बनत वनक मोपैं मुख,
सुधि बुधि सरब भई समनोती॥ [4]
- श्री रूप रसिक देवाचार्य, नित्य विहार पदावली (63)
श्री श्यामसुंदर अपने कर-कमलों में दर्पण लिए हुए दिखा रहे हैं एवं श्री श्यामा जू उसमें देख-देख के अपने सिर पर सुशोभित मोती को संवार रही हैं। [1]
सुंदरवर श्री कृष्ण एकटक श्री श्यामा जू को निहार रहे हैं, जिनका वदनामृत रस की खान है एवं चंद्रज्योति के समान देदीप्यमान है। [2]
रस की प्यासी सखियाँ युगल किशोर की अलौकिक रूपरस माधुरी का पान कर अचंभित हैं। [3]
सखी भावापन्न श्री रूप रसिक देवाचार्य जी अपनी सुध बुध खोकर कहती हैं कि मेरे मुख से श्री श्यामाश्याम की इस सुन्दर दिव्य झाँकी का वर्णन करते नहीं बनता l [4]
स्यांमा जू संवारत सीस के मोती। [1]
इकटक रहे निरखि सुंदर वर,
सुधासदन ससिवदनी की जोती॥ [2]
रूपरसिक रस-चसक चसे चखि,
लखि लखि सखी सोभा अनहोती। [3]
कहत न बनत वनक मोपैं मुख,
सुधि बुधि सरब भई समनोती॥ [4]
- श्री रूप रसिक देवाचार्य, नित्य विहार पदावली (63)
श्री श्यामसुंदर अपने कर-कमलों में दर्पण लिए हुए दिखा रहे हैं एवं श्री श्यामा जू उसमें देख-देख के अपने सिर पर सुशोभित मोती को संवार रही हैं। [1]
सुंदरवर श्री कृष्ण एकटक श्री श्यामा जू को निहार रहे हैं, जिनका वदनामृत रस की खान है एवं चंद्रज्योति के समान देदीप्यमान है। [2]
रस की प्यासी सखियाँ युगल किशोर की अलौकिक रूपरस माधुरी का पान कर अचंभित हैं। [3]
सखी भावापन्न श्री रूप रसिक देवाचार्य जी अपनी सुध बुध खोकर कहती हैं कि मेरे मुख से श्री श्यामाश्याम की इस सुन्दर दिव्य झाँकी का वर्णन करते नहीं बनता l [4]

