मेरी चुँदरी में पड़ गयो दाग री,
ऐसी चटक रंग डारो श्याम। [1]
मोहू सी केतिक ब्रज सुन्दरि,
उनसों न खेलै फाग री॥ [2]
औरन को अचरा न छुए,
याकी मोही सो पड़ रही लाग री। [3]
'बलिदास' वास ब्रज छोड़ो,
ऐसी होरी में लग जाये आग री॥ [4]
- श्री बलिदास जी (ब्रज के लोकगीत)
श्री श्यामसुंदर ने ऐसी चटक रंग डाली की मेरी चुनरी में दाग लग गया है । [1]
मेरी जैसी कितनी ही ब्रज सुंदरियाँ हैं, लेकिन उनमें से किसी के संग श्री कृष्ण होली नहीं खेल रहे। [2]
ब्रज सुंदरियों में से किसी का भी आंचल श्री कृष्ण स्पर्श नहीं कर रहे हैं, इनको केवल मुझसे ही काम है। [3]
श्री बलिदास जी प्रेमपूर्वक कहते हैं कि श्री कृष्ण ने इतना अधिक रंग डाला है कि ब्रजवास छोड़ कर भागना पड़ेगा, आग लगे ऐसी होली में । [4]
ऐसी चटक रंग डारो श्याम। [1]
मोहू सी केतिक ब्रज सुन्दरि,
उनसों न खेलै फाग री॥ [2]
औरन को अचरा न छुए,
याकी मोही सो पड़ रही लाग री। [3]
'बलिदास' वास ब्रज छोड़ो,
ऐसी होरी में लग जाये आग री॥ [4]
- श्री बलिदास जी (ब्रज के लोकगीत)
श्री श्यामसुंदर ने ऐसी चटक रंग डाली की मेरी चुनरी में दाग लग गया है । [1]
मेरी जैसी कितनी ही ब्रज सुंदरियाँ हैं, लेकिन उनमें से किसी के संग श्री कृष्ण होली नहीं खेल रहे। [2]
ब्रज सुंदरियों में से किसी का भी आंचल श्री कृष्ण स्पर्श नहीं कर रहे हैं, इनको केवल मुझसे ही काम है। [3]
श्री बलिदास जी प्रेमपूर्वक कहते हैं कि श्री कृष्ण ने इतना अधिक रंग डाला है कि ब्रजवास छोड़ कर भागना पड़ेगा, आग लगे ऐसी होली में । [4]

