सुख अपनौ चाहै नहीं - श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (443.2)

सुख अपनौ चाहै नहीं - श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (443.2)

सुख अपनौ चाहै नहीं, यही प्रीति की रीति।
पै बिच लोचन लालची, बरबस करत अनीति॥

- श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (443.2)

हे श्री राधा! स्वयं का सुख न चाहकर आपको सुख पहुँचाना ही प्रीति की रीति है। परंतु मेरे ये लालची नेत्र, आपके दर्शन की लालसा से, प्रति पल लालच में भर कर, बरबस अनीति करते रहते हैं ।