नयो होरी को खिलार आजु घात में आयौ।
झपटि फेंट कर गह्यो लाड़िली गाल गुलाल लगायौ॥ [1]
मन्द मन्द मुसिकाति छबीली नैननि सैन जनायौ।
छीन लियो पट पीत मुरलिका दै दै ताल नचायौ॥ [2]
संग सखी ललिता हरिदासी हँसि हँसि मोद बढ़ायौ।
श्रीराधारसिक नव कुंजविहारिनि ऐसौ फाग मचायौ॥ [3]
- श्री राधा प्रसाद देव जू
फाग के नये खिलाड़ी श्रीबिहारीजी महाराज आज श्रीकिशोरीजी के दाव पर चढ़ गये हैं। किशोरीजी ने झपट कर एक हाथ से उनकी फेंट पकड़ ली है और दूसरे से गालों पर गुलाल मल दिया हैं। [1]
छबीली प्रिया फिर मन्द-मन्द मुस्कराती हुई अपने आंतरिक भावों को नयन-संकेतों से अभिव्यक्त कर रही हैं। इतना ही नहीं, उन्होंने श्रीलालजी का पीताम्वर एवं मुरली भी छीनकर अपने अधिकार में कर ली है और ताली पीट-पीट कर उन्हें नचा रही हैं। [2]
सदा संग रहने वाली ललिता सखी श्रीहरिदासी जी हँस-हँसकर इस आनन्द-समुद्र को अधिक तरंगित कर रही हैं। श्री राधाप्रसाद जी कहते हैं कि नवल रसिक श्री बिहारीजी एवं नित्य-विहारिणी श्रीश्यामाजी निरंतर ऐसा ही 'फाग-महोत्सव मनाया करते हैं। [3]
झपटि फेंट कर गह्यो लाड़िली गाल गुलाल लगायौ॥ [1]
मन्द मन्द मुसिकाति छबीली नैननि सैन जनायौ।
छीन लियो पट पीत मुरलिका दै दै ताल नचायौ॥ [2]
संग सखी ललिता हरिदासी हँसि हँसि मोद बढ़ायौ।
श्रीराधारसिक नव कुंजविहारिनि ऐसौ फाग मचायौ॥ [3]
- श्री राधा प्रसाद देव जू
फाग के नये खिलाड़ी श्रीबिहारीजी महाराज आज श्रीकिशोरीजी के दाव पर चढ़ गये हैं। किशोरीजी ने झपट कर एक हाथ से उनकी फेंट पकड़ ली है और दूसरे से गालों पर गुलाल मल दिया हैं। [1]
छबीली प्रिया फिर मन्द-मन्द मुस्कराती हुई अपने आंतरिक भावों को नयन-संकेतों से अभिव्यक्त कर रही हैं। इतना ही नहीं, उन्होंने श्रीलालजी का पीताम्वर एवं मुरली भी छीनकर अपने अधिकार में कर ली है और ताली पीट-पीट कर उन्हें नचा रही हैं। [2]
सदा संग रहने वाली ललिता सखी श्रीहरिदासी जी हँस-हँसकर इस आनन्द-समुद्र को अधिक तरंगित कर रही हैं। श्री राधाप्रसाद जी कहते हैं कि नवल रसिक श्री बिहारीजी एवं नित्य-विहारिणी श्रीश्यामाजी निरंतर ऐसा ही 'फाग-महोत्सव मनाया करते हैं। [3]

