आज बिरज में होरी रे रसिया - श्री चन्द्रसखी जी

आज बिरज में होरी रे रसिया - श्री चन्द्रसखी जी

आज बिरज में होरी रे रसिया। होरी रे होरी रे बरजोरी रे रसिया।
घर घर से ब्रज बनिता आई, कोई श्यामल कोई गोरी रे रसिया। आज…[1]
इत तें आये कुंवर कन्हाई, उत तें आईं राधा गोरी रे रसिया। आज…[2]
कोई लावे चोवा कोई लावे चंदन, कोई मले मुख रोरी रे रसिया। आज …[3]
उडत गुलाल लाल भये बदरा, मारत भर भर झोरी रे रसिया। आज …[4]
चन्द्रसखी भज बाल कृष्ण प्रभु, चिर जीवो यह जोडी रे रसिया। आज …[5]

- श्री चन्द्रसखी जी

हे सखी, आज ब्रज में होली का उत्सव है जिसमें सब ज़बरदस्ती एक दूसरे पर रंग डालेंगें ।
घर-घर से ब्रज बालायें आयीं हैं, जिनमें कोई श्यामल तो कोई गौर वर्ण की हैं । [1]

इस होली के महोत्सव में एक ओर से कुंवर कन्हिया श्री कृष्ण आये हैं और दूसरी ओर से गौर वर्ण की श्री राधा आई हैं । [2]

कुछ सखियाँ चोवा (इत्र) लेकर आयीं हैं और कुछ सखियाँ चन्दन लेकर आयी हैं, कोई मुख-कमल पर गुलाल लगा रही हैं । [3]

इस होली उत्सव के बीच, आकाश लाल रंग में रंग गया है क्योंकि श्री राधा, श्री कृष्ण और सखियाँ उत्साहपूर्वक एक दूसरे पर झोली भर-भर के गुलाल उड़ा रहे हैं। [4]

श्री चन्द्रसखी जी कहती हैं कि गुरुदेव श्री बालकृष्ण जी की कृपा से मैं इस दिव्य होली-ली लाका कर दर्शन कर, युगल जोड़ी श्री श्यामाश्याम को यह आशीर्वाद देती हूँ कि यह जोड़ी चिरकाल तक ऐसी ही आनंद समुद्र में डूबती रहे। [5]