नैनन में पिचकारी दई, मोहे गारी दई, होरी खेली न जाय।
क्यों रे लंगर लंगराई मोसे कीनी, केसर कीच कपोलन दीनी
लिये गुलाल ठाडो ठाडो मुसकाय, होरी खेली न जाय॥ [1]
नेक न कान करत काहू की, नजर बचावे भैया बलदाऊ की
पनघट से घर लों बतराय, होरी खेली ने जाय॥ [2]
ओचक कुचन कुमकुमा मारे, रंग सुरंग सीस पे डारे
यह ऊधम सुन सास रिसाय, होरी खेली न जाय॥ [3]
होरी के दिनन मोसे दूनो दूनो अटके, सालीगराम कौन जाय हटके
अंग चुपट हँसी हा हा खाय, होरी खेली न जाय॥ [4]
- श्री शालिग्राम जी (ब्रज के लोकगीत)
अरे कृष्ण, तुमने मेरी आँखों में पिचकारी मार दी, मुझे गाली भी दी, मुझसे अब होली खेली नहीं जाती।
क्यों रे नटखट, तूने मेरे साथ उपद्रव क्यों किया ? मेरे गालों पर केसर का कीच लगा दिया, और अब हाथ में गुलाल लिए खड़े-खड़े मुस्कुरा रहा है, मुझसे होली खेली नहीं जाती। [1]
क्यों रे कृष्ण, तू थोड़ा सा भी किसी का कहा नहीं मानता, अपने बलराम भैया से नज़र बचाकर छुपता रहता है, पनघट से घर पहुंचने तक तू बातें करता रहता है, मुझसे अब होली खेली नहीं जाती। [2]
तू अचानक आकर मेरे अंगों में कुमकुम लगा देता है, सिर पर लाल रंग डाल देता है, तेरा यह उधम सुनकर मेरी सास गुस्सा करती है, मुझसे अब होली खेली नहीं जाती। [3]
श्री शालिग्राम जी कहते हैं कि - सखी श्री कृष्ण से कहती है "होली के दिनों में तू बहुत अधिक मेरे पास रहने का प्रयास करता है, तुझसे कौन झगड़ने जाए ? तुझसे कुछ कहा तो अंग में चुटकी मार कर तू ठहाके मार के हँसने लगता है, मुझसे अब होली खेली नहीं जाती।" [4]
क्यों रे लंगर लंगराई मोसे कीनी, केसर कीच कपोलन दीनी
लिये गुलाल ठाडो ठाडो मुसकाय, होरी खेली न जाय॥ [1]
नेक न कान करत काहू की, नजर बचावे भैया बलदाऊ की
पनघट से घर लों बतराय, होरी खेली ने जाय॥ [2]
ओचक कुचन कुमकुमा मारे, रंग सुरंग सीस पे डारे
यह ऊधम सुन सास रिसाय, होरी खेली न जाय॥ [3]
होरी के दिनन मोसे दूनो दूनो अटके, सालीगराम कौन जाय हटके
अंग चुपट हँसी हा हा खाय, होरी खेली न जाय॥ [4]
- श्री शालिग्राम जी (ब्रज के लोकगीत)
अरे कृष्ण, तुमने मेरी आँखों में पिचकारी मार दी, मुझे गाली भी दी, मुझसे अब होली खेली नहीं जाती।
क्यों रे नटखट, तूने मेरे साथ उपद्रव क्यों किया ? मेरे गालों पर केसर का कीच लगा दिया, और अब हाथ में गुलाल लिए खड़े-खड़े मुस्कुरा रहा है, मुझसे होली खेली नहीं जाती। [1]
क्यों रे कृष्ण, तू थोड़ा सा भी किसी का कहा नहीं मानता, अपने बलराम भैया से नज़र बचाकर छुपता रहता है, पनघट से घर पहुंचने तक तू बातें करता रहता है, मुझसे अब होली खेली नहीं जाती। [2]
तू अचानक आकर मेरे अंगों में कुमकुम लगा देता है, सिर पर लाल रंग डाल देता है, तेरा यह उधम सुनकर मेरी सास गुस्सा करती है, मुझसे अब होली खेली नहीं जाती। [3]
श्री शालिग्राम जी कहते हैं कि - सखी श्री कृष्ण से कहती है "होली के दिनों में तू बहुत अधिक मेरे पास रहने का प्रयास करता है, तुझसे कौन झगड़ने जाए ? तुझसे कुछ कहा तो अंग में चुटकी मार कर तू ठहाके मार के हँसने लगता है, मुझसे अब होली खेली नहीं जाती।" [4]

