(राग बसंत)
खेल बसंत फाग श्रीदम्पति, राजत हैं रंग भीने री।
अति अनुराग भरे मदमांते, गलबैंया दोउ दीने री॥ [1]
रूप रँगीले छैल छबीले, रति अनंग छबि छीने री।
मंद हँसनि दृगबंक बिलोकनि, सबके मन हरि लीने री॥ [2]
छलकत छटा प्रेम प्रति अंगन, नितही नेह नवीने री।
सरस माधुरी पिय प्यारी पर, सरबस वारण कीने री॥ [3]
- श्री सरस माधुरी
नित्य दम्पति श्री श्यामा श्याम प्रेम रंग में भींजे हुए वसंत ऋतु का होली खेल रहे हैं। दोनों अति अनुराग में भरे मदमस्त हैं एवं एक-दूसरे को गलबहियाँ दिए हुए हैं। [1]
दोनों किशोर-किशोरी सुन्दर श्रृंगार युक्त शोभा को प्राप्त हो रहे हैं एवं एक-दूसरे की रूपमाधुरी रस के आस्वादन में मग्न हैं, जिनकी छवि के समक्ष रति-अनंग भी लज्जित हो रहे हैं। दोनों के मुख मण्डल पर मंद मुस्कान है, तिरछी चितवन है, जो सबके मन को हरण कर रहे हैं। [2]
प्रिया-प्रियतम के प्रत्येक अंग से प्रेम की छटा छलक रही है जिनका नेह नित्य नवीन है । श्री सरस माधुरी जी कहते हैं कि ऐसे पिय प्यारी पर मैं अपना सर्वस्व न्योंछावर करता हूँ। [3]
खेल बसंत फाग श्रीदम्पति, राजत हैं रंग भीने री।
अति अनुराग भरे मदमांते, गलबैंया दोउ दीने री॥ [1]
रूप रँगीले छैल छबीले, रति अनंग छबि छीने री।
मंद हँसनि दृगबंक बिलोकनि, सबके मन हरि लीने री॥ [2]
छलकत छटा प्रेम प्रति अंगन, नितही नेह नवीने री।
सरस माधुरी पिय प्यारी पर, सरबस वारण कीने री॥ [3]
- श्री सरस माधुरी
नित्य दम्पति श्री श्यामा श्याम प्रेम रंग में भींजे हुए वसंत ऋतु का होली खेल रहे हैं। दोनों अति अनुराग में भरे मदमस्त हैं एवं एक-दूसरे को गलबहियाँ दिए हुए हैं। [1]
दोनों किशोर-किशोरी सुन्दर श्रृंगार युक्त शोभा को प्राप्त हो रहे हैं एवं एक-दूसरे की रूपमाधुरी रस के आस्वादन में मग्न हैं, जिनकी छवि के समक्ष रति-अनंग भी लज्जित हो रहे हैं। दोनों के मुख मण्डल पर मंद मुस्कान है, तिरछी चितवन है, जो सबके मन को हरण कर रहे हैं। [2]
प्रिया-प्रियतम के प्रत्येक अंग से प्रेम की छटा छलक रही है जिनका नेह नित्य नवीन है । श्री सरस माधुरी जी कहते हैं कि ऐसे पिय प्यारी पर मैं अपना सर्वस्व न्योंछावर करता हूँ। [3]

