(राग बसंत)
खेलत मदन गोपाल बंसत ।
नागरि नवल रसिक-चूडामनि, सब बिधि रसिक राधिका कंत ॥ [1]
नैन-नैन-प्रति चारु बिलोकनि, बदन-बदन-प्रति सुंदर हास ।
अंग-अंग प्रति प्रीति निरंतर, रितु आगम निसि करहिं विलास ॥ [2]
बाजत ताल मृदंग अधौटी, डफ बाँसुरी कोलाहल केलि ।
'परमानंद' स्वामी के संगम, मिलि नाचत-गावत रँग-केलि ॥ [3]
- श्री परमानन्द दास जी, परमानंद सागर (1165)
श्री मदन गोपाल आज बसंत खेल रहे हैं । उनके संग में नवल रसिक चूड़ामणि श्री राधिका हैं जिनके संग राधिका कंत श्री श्यामसुन्दर शोभायमान हैं । [1]
श्री श्यामा श्याम के चपल अनियारे नयनों की चितवन, एवं रसमय मृदुल हास करती हुई सुंदर छवि की शोभा देखते ही बनती है ।बसंत ऋतु के आगमन में यह जोड़ी रात्रि को विलास कर रही है जिनके अंगों प्रतियंगों से नित्य प्रेम रस का वर्षण होता है । [2]
मृदंग, अधौटी, डफ़, बांसुरी आदि की ताल बज रही है एवं दोनों प्रिया प्रियतम केली कर रहे हैं । श्री परमानंद दास जी कहते हैं कि श्री राधा कृष्ण की रंग केली के समागम में सखियाँ मिलकर नाच गान कर रही हैं । [3]
खेलत मदन गोपाल बंसत ।
नागरि नवल रसिक-चूडामनि, सब बिधि रसिक राधिका कंत ॥ [1]
नैन-नैन-प्रति चारु बिलोकनि, बदन-बदन-प्रति सुंदर हास ।
अंग-अंग प्रति प्रीति निरंतर, रितु आगम निसि करहिं विलास ॥ [2]
बाजत ताल मृदंग अधौटी, डफ बाँसुरी कोलाहल केलि ।
'परमानंद' स्वामी के संगम, मिलि नाचत-गावत रँग-केलि ॥ [3]
- श्री परमानन्द दास जी, परमानंद सागर (1165)
श्री मदन गोपाल आज बसंत खेल रहे हैं । उनके संग में नवल रसिक चूड़ामणि श्री राधिका हैं जिनके संग राधिका कंत श्री श्यामसुन्दर शोभायमान हैं । [1]
श्री श्यामा श्याम के चपल अनियारे नयनों की चितवन, एवं रसमय मृदुल हास करती हुई सुंदर छवि की शोभा देखते ही बनती है ।बसंत ऋतु के आगमन में यह जोड़ी रात्रि को विलास कर रही है जिनके अंगों प्रतियंगों से नित्य प्रेम रस का वर्षण होता है । [2]
मृदंग, अधौटी, डफ़, बांसुरी आदि की ताल बज रही है एवं दोनों प्रिया प्रियतम केली कर रहे हैं । श्री परमानंद दास जी कहते हैं कि श्री राधा कृष्ण की रंग केली के समागम में सखियाँ मिलकर नाच गान कर रही हैं । [3]

