प्रियालाल खेलत बसंत ।
झाँझ, मुरज, डफ, बाँसुरी अरु वीना-मुहचंग लसंत ॥ [1]
बजत, नचत, नवनव गति अद्भुत, दोऊ मिलि हुलसंत।
श्रीललितमोहिनी कौ सुख बाढयौ, पूरन रस विलसंत ॥ [2]
- श्री ललित मोहिनी देव, ललित मोहिनी देव जू की वाणी, रस के पद (51)
प्रियाप्रियतम फाग खेल रहे हैं। झाँझ, मृदंग, डफ, वंशी, वीणा और मुहचंग सुन्दर सुरीली तान में बज रहे हैं । [1]
दोनों प्रियाप्रियतम मिलकर नृत्य की नई-नई विलक्षण गतियों से नाचते हुए उल्लसित हो रहे हैं। पूर्ण रस की इस विलास लीला का अवलोकन करते-करते श्रीयुगल की अन्तरंग सहचरी श्रीललितमोहिनीजी का सुख भी निरन्तर बढ़ता ही चला जा रहा है । [2]
झाँझ, मुरज, डफ, बाँसुरी अरु वीना-मुहचंग लसंत ॥ [1]
बजत, नचत, नवनव गति अद्भुत, दोऊ मिलि हुलसंत।
श्रीललितमोहिनी कौ सुख बाढयौ, पूरन रस विलसंत ॥ [2]
- श्री ललित मोहिनी देव, ललित मोहिनी देव जू की वाणी, रस के पद (51)
प्रियाप्रियतम फाग खेल रहे हैं। झाँझ, मृदंग, डफ, वंशी, वीणा और मुहचंग सुन्दर सुरीली तान में बज रहे हैं । [1]
दोनों प्रियाप्रियतम मिलकर नृत्य की नई-नई विलक्षण गतियों से नाचते हुए उल्लसित हो रहे हैं। पूर्ण रस की इस विलास लीला का अवलोकन करते-करते श्रीयुगल की अन्तरंग सहचरी श्रीललितमोहिनीजी का सुख भी निरन्तर बढ़ता ही चला जा रहा है । [2]

