छबीली नागरी हो धन - श्री हित रूप लाल

छबीली नागरी हो धन - श्री हित रूप लाल

छबीली नागरी हो धन, तेरौ परम सुहाग । [1]
तेरेइ रंग रँग्यौ मन मोहन, मानत है बड़ भाग ॥ [2]
आज फबी होरी प्रीतम संग, लखियत है अनुराग । [3]
(जै श्री) रूपलाल हित रूप छके दृग, उपमा कौं नहिं लाग ॥ [4]

- श्री हित रूप लाल

हे छबीली राधिके, आप धन्य धन्य हो क्योंकि आपका सुहाग अनादि एवं सर्वोत्कृष्ट है ।  [1]

आपके प्रियतम मनमोहन (श्री कृष्ण) सदा आपके रंग में रंगे रहते हैं जिसको वे अपना बड़भाग मानते हैं । [2]

आज प्रियतम के संग आप होली खेल रही हो जिसकी सुंदर छवि अनुराग रस बरसा रही है । [3]

श्री हित रूप लाल कहते हैं कि मेरे नयन तो आपकी मनमोहक छवि से ऐसे छके हुए हैं कि इस छवि की उपमा देते नहीं बनती ।  [4]