वृन्दावन की साधुगति, कापे बरणी जाय ।
जैसी जाकी दृष्टि है, तैसो ही दरशाय ॥
- श्री चरण दास, भक्तिसागर
श्री वृंदावन धाम के रसिकों की गति का वर्णन करना सर्वथा असंभव है क्योंकि जिसकी जैसी दृष्टि होती है उसको वैसे ही दिखती है ।
जैसी जाकी दृष्टि है, तैसो ही दरशाय ॥
- श्री चरण दास, भक्तिसागर
श्री वृंदावन धाम के रसिकों की गति का वर्णन करना सर्वथा असंभव है क्योंकि जिसकी जैसी दृष्टि होती है उसको वैसे ही दिखती है ।

