विष्णोर्निवासमपरे त्रिपुरारि वासं ये संश्रयन्ति सुधिया विधिना श्रयन्तु ।
अस्माकमेव गिरिराज तटान्तराले कालन्तरेपि भवताज्जनि रुद्भिजेषु ॥
- श्री केशवाचार्य, गोवर्द्धन शतक (12)
जो कोई अपनी सुबुद्धि के दारा विष्णुलोक में अथवा शिवलोक में निवास करना चाहता है वे भली प्रकार करें किन्तु हम तो यही चाहते हैं कि कालान्तर में जब कभी जन्म घारण करना पड़े तो यद्यपि कीट आदि देह मिले तथापि श्री गोवद्धन के निकट आस पास की भूमि में ही होवे ।
अस्माकमेव गिरिराज तटान्तराले कालन्तरेपि भवताज्जनि रुद्भिजेषु ॥
- श्री केशवाचार्य, गोवर्द्धन शतक (12)
जो कोई अपनी सुबुद्धि के दारा विष्णुलोक में अथवा शिवलोक में निवास करना चाहता है वे भली प्रकार करें किन्तु हम तो यही चाहते हैं कि कालान्तर में जब कभी जन्म घारण करना पड़े तो यद्यपि कीट आदि देह मिले तथापि श्री गोवद्धन के निकट आस पास की भूमि में ही होवे ।

